साड़ी प्रेस करवाते हुए चुदाई की यह अनोखी और गर्म हिंदी सेक्स कहानी है जहाँ एक बीवी ने अपने पति से साड़ी प्रेस करवाने के बहाने अपनी चूत भी चुदवा ली। मई के महीने में एक शादी में जाने से पहले बीवी ने पति से साड़ी और ब्लाउज प्रेस करने को कहा, और पति ने शर्त रखी – “जब तक मैं साड़ी प्रेस करूंगा, तब तक तुम्हारी चूत भी चोदूंगा”। इस साड़ी प्रेस करवाते हुए चुदाई के किस्से में आप पढ़ेंगे कैसे बीवी ने पहले पति का लंड चूसा, फिर खड़े होकर पीछे से चूत में लंड लिया, और कैसे पति ने इस्त्री चलाते हुए एक साथ बीवी की चूत सटासट चोदी। साड़ी प्रेस करवाते हुए चुदाई का यह अनुभव इतना मादक था कि बीवी की चूत ने दो बार पानी छोड़ दिया और पति का गर्म लावा उसकी बच्चेदानी तक जा पहुँचा। अगर आपको घरेलू माहौल में होने वाली सच्ची और बेहद गर्म चुदाई की कहानियाँ पसंद हैं, तो यह आपके लिए ही है।
भाग 1: चुदाई के शौकीन पति-पत्नी – कहीं भी, कभी भी
हम दोनों पति-पत्नी चुदाई के बहुत शौकीन हैं। यूँ समझ लीजिए कि हम तो बस चुदाई करने के लिए मौके की तलाश में ही रहते हैं। हमें जब भी मौका मिलता है, हम चुदाई करने लग जाते हैं। चाहे सुबह हो या शाम, चाहे दिन हो या रात – हमारे लिए कोई समय नहीं होता। मैं और मेरे पति कहीं भी, कभी भी, चुदाई कर लेते हैं। कभी किचन में, कभी बाथरूम में, कभी लिविंग रूम में, तो कभी बेडरूम में। घर का हर कोना हमारी चुदाई का गवाह रहा है।
मैं तो घर के कुछ काम भी पति से चुदवाते हुए ही करती हूँ। मैं ऐसे काम ढूंढ लेती हूँ जिसमें मैं खड़ी हो सकूँ, आगे की तरफ झुक सकूँ, ताकि मेरे पति आसानी से पीछे से अपना लंड मेरी चूत में डाल सकें। मुझे ऐसे करने में बहुत मज़ा आता है – एक तरफ मेरा घर का काम हो जाता है, दूसरी तरफ मेरी चूत की प्यास भी बुझ जाती है। मेरे पति को भी यह बहुत पसंद है। उन्हें लगता है कि इस तरह से चुदाई करने में एक अलग ही तरह का रोमांच होता है – जैसे कोई छुपा हुआ खेल हो, जैसे कोई राज़ हो जिसे सिर्फ हम दोनों जानते हैं।
हमारी सेक्स लाइफ हमेशा से ही बहुत अच्छी रही है, लेकिन जब से हमने इस तरह के “मल्टीटास्किंग” चुदाई के तरीके अपनाए हैं, तब से तो हमारा जुनून और भी बढ़ गया है। मेरे पति का लंड करीब साढ़े छह इंच लंबा है और काफी मोटा है। उनके अंडे बड़े-बड़े हैं जो चुदाई के दौरान मेरी चूत से टकराते हैं और मुझे और भी उत्तेजित कर देते हैं। मेरी चूत छोटी और टाइट है, बिल्कुल गुलाबी और बाल रहित। मैं हर हफ्ते इसे शेव करवाती हूँ ताकि यह हमेशा साफ और मुलायम बनी रहे। मेरे पति को मेरी चूत की इस सफाई से प्यार है – वह कहते हैं कि बाल रहित चूत चाटने और चोदने में सबसे ज्यादा मजा आता है।
वैसे तो हम रोजाना चुदाई करते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसे मौके आते हैं जब चुदाई और भी खास हो जाती है। ऐसा ही एक मौका था वह मई का महीना।
भाग 2: साड़ी प्रेस करने की शर्त और लंड चूसने की शुरुआत
वो मई का महीना था। गर्मी अपने चरम पर थी। बाहर तेज़ धूप थी और अंदर कमरे में पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था। हम दोनों को एक रिश्तेदार के घर शादी में जाना था। शाम की शादी थी, तो हमें तैयार होने में कोई जल्दी नहीं थी, लेकिन कपड़ों को प्रेस करना जरूरी था। मेरे पति को इस्त्री करना बहुत अच्छे से आता है। वह अपने सारे कपड़े खुद ही प्रेस करते हैं – बिल्कुल सीधी-सीधी लाइनों के साथ, जैसे किसी दुकान से निकले हों।
मैंने अपने पति को अल्मारी से कपड़े निकालकर प्रेस करने के लिए दे दिए। उन्होंने टेबल पर इस्त्री रखी, बिजली का प्लग लगाया, और इस्त्री गर्म होने लगी। जैसे ही इस्त्री गर्म हुई, वो अपने कपड़े प्रेस करने लगे। पहले उन्होंने अपनी शर्ट प्रेस की, फिर अपनी पैंट। बहुत ही शानदार तरीके से – एक बार में सारी क्रीज़ निकल गईं। मैं उन्हें देख रही थी और सोच रही थी कि काश मुझे भी इतना अच्छे से इस्त्री करना आता। लेकिन मेरे हाथ से एक बार मेरी बहुत पसंदीदा साड़ी जल गई थी – उस दिन के बाद से मैंने कसम खा ली थी कि अब कभी साड़ी प्रेस नहीं करूंगी। साड़ी प्रेस करना बहुत मुश्किल काम है – एक जरा सी चूक और पूरी साड़ी खराब हो सकती है।
मैंने खुद को पहनने के लिए एक बहुत ही खूबसूरत बनारसी साड़ी निकाली थी – लाल रंग की, जिस पर सोने का जरी का काम था। साथ में एक मैचिंग ब्लाउज भी था – जो थोड़ा कटा हुआ था और पीछे से डीप नेक था। ये दोनों कपड़े भी प्रेस किए जाने के लिए बेहद जरूरी थे। मैंने अपने पति से प्यार से कहा – “जानू, मेरी भी साड़ी और ब्लाउज प्रेस कर दो ना। तुम्हारे हाथ में तो जादू है, तुम बहुत अच्छे से प्रेस करते हो।”
मेरे पति ने एक शरारती मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा। वह बोले – “मैं साड़ी तो प्रेस करके दूंगा, लेकिन उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?” उनकी आँखों में वही चमक थी जो हमेशा चुदाई से पहले आ जाती है। मैं उन्हें बहुत अच्छे से जानती थी – उनके दिमाग में सिर्फ एक ही चीज़ चल रही थी। मैंने शरारत से पूछा – “आपको क्या चाहिए?”
मेरे पति ने सीधे अपनी बात रखी – “जब तक मैं तुम्हारी साड़ी और ब्लाउज प्रेस करूँगा, तब तक मैं तुम्हारी चूत भी साथ में चोदूँगा। एक हाथ से इस्त्री चलाऊंगा और दूसरी तरफ… तुम समझ गई न?”
मैं दिल ही दिल में मुस्करा दी। मुझे तो खुद भी यही चाहिए था। मैंने झट से हाँ कह दिया – बिना एक पल की देरी के। “बिल्कुल, जैसी आपकी मर्जी। लेकिन एक शर्त – मेरी साड़ी बिल्कुल सही से प्रेस होनी चाहिए। कोई क्रीज़ नहीं रहनी चाहिए।”
मेरे पति ने कहा – “डील पक्की। अब तुम बताओ कैसे करना है।”
मेरे पति ने अपने कपड़े प्रेस करके हैंगर को लटका दिए। अब बारी थी मेरे कपड़ों की। मैंने उनसे कहा – “पहले मेरा ब्लाउज प्रेस करो। वह छोटा है, जल्दी हो जाएगा।”
मैंने सोचा कि पहले मैं उनका मूड बना दूँ – थोड़ा मुख-मैथुन करवा दूँ ताकि उनका लंड पूरी तरह खड़ा हो जाए और फिर चूत में डालने में आसानी हो। मैं अपने पति के सामने अपने घुटनों के बल बैठ गई। फर्श पर थोड़ा सा कपड़ा बिछा लिया ताकि घुटनों को चोट न लगे। मैंने आगे बढ़कर उनके पैंट का हुक खोला। फिर धीरे-धीरे जिप को नीचे उतारा। उनकी पैंट ढीली हो गई। मैंने पैंट और चड्डी को एक साथ पकड़ा और नीचे उनके पैरों में खिसका दिया।
मेरे सामने अब मेरे पति का मुरझाया हुआ लंड था – थोड़ा ढीला, लेकिन फिर भी अपनी मोटाई के कारण भारी लग रहा था। मैंने पहले उसे अपनी हथेली में लिया – वह गर्म था, मुलायम था। फिर मैंने अपनी उँगलियों से उसे सहलाना शुरू किया – धीरे-धीरे, प्यार से, ऊपर से नीचे तक। उनके नीचे झूलते अंडों को भी मैंने अपने हाथों में लिया और हल्के से दबाया – न तो ज्यादा ताकत से, न बहुत हल्के से। मेरा हाथ लगते ही उनका लंड फनफनाने लगा। मैंने उसे बढ़ते हुए देखा – धीरे-धीरे, सेकंड-दर-सेकंड। पहले वह थोड़ा सख्त हुआ, फिर और सख्त, और फिर पूरी तरह खड़ा हो गया – लोहे की रॉड जैसा। उस पर नसें उभर आई थीं, सुपारी बैंगनी पड़ गई थी और चमकने लगी थी। पति के लंड ने जल्द ही अपना पूरा आकार ले लिया – साढ़े छह इंच का वो लंड अब पूरी तरह तैयार था।
मैंने उनका लंड अपने मुँह में भर लिया। पहले सिर्फ सुपारी – उसे अपने होठों से दबाया, फिर जीभ से गोल-गोल घुमाया। उसमें से प्री-कम की हल्की मिठास आ रही थी। फिर मैंने पूरे लंड को धीरे-धीरे अपने मुँह में ले लिया – जितना हो सके उतना। मैंने अपना मुँह आगे-पीछे करना शुरू कर दिया – धीमी गति से, फिर तेज। हर बार जब मैं आगे बढ़ती, उनका लंड मेरे गले तक पहुँच जाता। मुझे हल्की घुटन होती, लेकिन उस घुटन में भी एक अलग ही मजा था। मेरे पति ने मेरे बाल पकड़ लिए और मेरा सिर उनके लंड पर दबाने लगे। वह चाहते थे कि मैं और गहरा लूँ। मैंने उनकी इच्छा पूरी की – अपना मुँह और नीचे किया। मेरे मुँह से “चुप-चुप” की आवाज़ें आने लगीं – जो उन्हें बहुत पसंद है। मैं अपने पति का लंड पाँच मिनट तक चूसती रही – इतनी देर तक कि मेरा मुँह पूरी तरह गीला हो गया, और उनका लंड मेरी लार से लथपथ हो गया। मैंने यह इसलिए किया था ताकि जब वह मेरी चूत में लंड डालें, तो आसानी से घुस जाए। मेरी चूत भी अब इस सब को देखकर गीली हो चुकी थी – मुझे अपने नीचे हल्की नमी महसूस हो रही थी।
भाग 3: खड़े होकर पीछे से चूत में लंड डाला
मेरे ब्लाउज को प्रेस करके मेरे पति ने उसे एक तरफ रख दिया। ब्लाउज बिल्कुल सही प्रेस हुआ था – एक भी क्रीज़ नहीं थी। अब बारी थी मेरी साड़ी की – वह लाल बनारसी साड़ी जिसे मैं बहुत चाहती थी। मैं उठकर खड़ी हो गई। मेरे घुटनों में हल्का दर्द था – पाँच मिनट तक घुटनों के बल बैठे रहने से। लेकिन उस दर्द में भी मजा था। मैंने अपनी साड़ी और पेटीकोट एक साथ उठा लिया। नीचे मैंने अपनी फूलों की डिज़ाइन वाली चड्डी पहनी हुई थी – हल्के गुलाबी रंग की, जिस पर छोटे-छोटे फूल बने थे। मैंने वह चड्डी भी निकाल दी – एकदम आराम से, क्योंकि वह ढीली थी। अब मैं नीचे से पूरी तरह नंगी थी। मैंने अपने पति की तरफ अपनी गोरी गांड कर दी – मेरी गांड गोल और मोटी है, जिसे मेरे पति बहुत पसंद करते हैं। फिर मैं आगे की तरफ झुक गई – अपने हाथों को टेबल के किनारे पर टिका दिया। मेरी पीठ सीधी थी और मेरी गांड ऊपर की तरफ उठी हुई थी। यह सबसे परफेक्ट पोजीशन थी – पीछे से चूत चोदने के लिए।
मेरे पति ने इस्त्री को एक तरफ रख दिया – प्लग निकालने की जरूरत नहीं थी क्योंकि इस्त्री गर्म ही रहनी चाहिए थी। वह मेरे पीछे आ गए। मैंने उनके पैरों को अपने पैरों के पास महसूस किया। पहले उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरी गांड पर रख दिए। उनके हाथ गर्म थे – इस्त्री पकड़ने से। उस गर्माहट ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया। उन्होंने मेरे चूतड़ों को प्यार से मसलना शुरू कर दिया – धीरे-धीरे, गोल-गोल घुमाकर। मेरे चूतड़ उनके हाथों में आ रहे थे – इतने मुलायम और भरे हुए। फिर उन्होंने अपनी उँगलियाँ मेरे चूतड़ों के बीच की दरार में डाल दीं और ऊपर-नीचे करने लगे। उनकी उँगलियाँ मेरी गांड के छेद को छू रही थीं, फिर नीचे आकर मेरी चूत को। इस छेड़छाड़ से मेरी चूत और गीली हो गई।
अचानक उन्होंने मेरे एक चूतड़ पर एक जोरदार चपत मार दी – “सटाक!” की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज गई। मेरे मुँह से एक मीठी कराह निकल गई – “आह्ह्ह!” उस थप्पड़ से मेरी गांड लाल हो गई और उस जगह पर एक अच्छी सी गर्माहट फैल गई। मुझे वह दर्द बहुत अच्छा लगा। मेरे पति जानते हैं कि थप्पड़ मुझे कितना पसंद है – यह हमारे सेक्स का एक अहम हिस्सा है।
अब उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे चूतड़ फैला दिए – मेरी गांड के दोनों गाल अलग हो गए और मेरी चूत पूरी तरह खुलकर सामने आ गई। मेरी चूत की गुलाबी फांकें उनके सामने थीं – गीली, चमकदार, और पूरी तरह तैयार। उन्होंने अपना तगड़ा लंड पकड़ा और उसे मेरी चूत के दरवाज़े पर लगा दिया। मैंने अपना हाथ पीछे बढ़ाकर उनके लंड को छुआ – वह अब भी मेरी लार से गीला था, और मेरे चूत के पानी के लिए पूरी तरह तैयार था। मैंने अपने थूक से उनका लंड और गीला कर दिया – हालाँकि उसकी कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन मैं चाहती थी कि बिल्कुल स्मूद एंट्री हो।
भाग 4: तीन जोरदार झटके और बच्चेदानी तक का सफर
पहले तो मेरे पति ने अपना आधा लंड धीरे-धीरे मेरी चूत में डाल दिया। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत की दीवारें उनके लंड को चारों तरफ से घेर रही हैं – टाइट, गर्म, और गीली। मैंने एक गहरी साँस ली – इस पोजीशन में लंड बहुत गहराई तक जाता है। वह थोड़ा रुके – मुझे एडजस्ट होने दिया। मैंने अपनी साँस सामान्य की। और फिर – उन्होंने एक जोरदार झटका मारा। एक ही झटके में अपना पूरा लंड मेरी नाजुक, कोमल, गुलाबी चूत में जड़ तक घुसा दिया। मेरे पति का लंड सीधे मेरे बच्चेदानी से जाकर टकराया। उस झटके की ताकत इतनी थी कि मैं आगे की तरफ लुढ़क गई।
“आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!” मेरे मुँह से एक जोरदार चीख निकल गई – दर्द और सुख दोनों की। वह चीख इतनी तेज थी कि शायद पड़ोस के घरों में भी सुनाई दी होगी। मैंने टेबल के किनारे को और जोर से पकड़ लिया – मेरे हाथ सफेद पड़ गए थे।
अभी मैं इस पहले हमले से खुद को संभाल पाती, तभी मेरे पति ने अपना लंड मेरी चूत से पूरी तरह बाहर निकाल लिया – सुपारे तक – और फिर दूसरा हमला कर दिया। फिर से वही धमाका – “घचाक!” फिर से लंड मेरी बच्चेदानी से टकराया। “आह्ह्ह!” मैं फिर चीखी।
तीसरी बार – उन्होंने फिर से बाहर निकाला और फिर से उसी ताकत से अंदर धकेल दिया। “धम्म!” मेरी चीख फिर से निकल गई – इस बार और तेज। इन तीनों झटकों से मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत से कुछ गर्म और गीला बाहर आ रहा है – वह मेरी चूत का रस था। मेरे पति के लंड पर मेरे चूत का पानी गिर रहा था, जिससे वह और चिकना हो गया था। अब उनका लंड मेरी चूत में आसानी से अन्दर-बाहर होने लगा था। चूत में पानी भर जाने से मेरी नाजुक कोमल गुलाबी चूत ने उनके लंड को अपना लिया था। लेकिन तब तक मेरी हालत खराब हो चुकी थी – मेरे पैर काँप रहे थे, मेरी साँसें तेज़ थीं, और मैं अपना संतुलन बनाए रखने के लिए टेबल से चिपकी हुई थी।
भाग 5: साड़ी प्रेस हो रही है और चूत चुद रही है – दोनों एक साथ
अब मेरे पति ने अपने दोनों हाथ मेरे चूतड़ों से हटा लिए। उन्होंने इस्त्री उठाई और मेरी साड़ी को प्रेस करना शुरू कर दिया। लेकिन उनका लंड अब भी मेरी चूत के अंदर था – और वह उसे अन्दर-बाहर करना जारी रखे हुए थे। अब मेरे पति एक साथ दो काम कर रहे थे – एक हाथ से इस्त्री चला रहे थे और अपनी कमर की गति से मेरी चूत चोद रहे थे। यह देखने और महसूस करने का नज़ारा बहुत ही अनोखा था।
मैंने अपने पति की चाल को महसूस किया – एक लय में, धीरे-धीरे, बिल्कुल आराम से। उनका लंड मेरी चूत में अन्दर-बाहर हो रहा था – जैसे कोई साँस ले रहा हो। मैं अपनी गांड आगे-पीछे करके उनका साथ देने लगी। मैंने अपनी गांड को उनके लंड के अन्दर आने के साथ पीछे की तरफ झटका दिया, और जब वह बाहर जाता, मैं आगे की तरफ झुक जाती। हम दोनों की गति एक हो गई थी – जैसे हम दोनों एक ही शरीर हों।
सच बताऊँ, इस वक्त मैं तो जन्नत की सैर कर रही थी। एक तरफ मेरा शरीर उनके लंड से चुद रहा था, दूसरी तरफ मैं देख रही थी कि मेरी बनारसी साड़ी की सिल्क की चमक वापस आ रही थी। इस्त्री की गर्मी साड़ी के हर कपड़े को छू रही थी, और उसी लय में उनका गर्म लंड मेरी चूत की हर दीवार को छू रहा था। मेरे पति अपने लंड से मेरी चूत सटासट चोद रहे थे – न बहुत तेज, न बहुत धीमा, बल्कि बिल्कुल सही गति से, जिससे मुझे लगातार आनंद मिल रहा था। मेरे पति का लंड मेरी चूत में जिस मस्ती से अन्दर-बाहर हो रहा था, उससे मेरी चूत से ‘पचपच.. खचपच.. खचापच..’ की आवाज़ें आ रही थीं। यह वो आवाज़ थी जो तब आती है जब चूत पूरी तरह गीली हो और लंड उसमें तेजी से घुसे और बाहर निकले। उस आवाज़ में एक अलग ही संगीत था – एक मादक, कामुक, पागल कर देने वाला संगीत।
मैं अपनी आँखें बंद किए हुए थी – सिर्फ महसूस कर रही थी। हर धक्के के साथ मेरे बूब्स हिल रहे थे – और ब्रा न होने के कारण वह आज़ादी से थिरक रहे थे। मेरे निप्पल सख्त हो गए थे और ब्लाउज के अंदर रगड़ खा रहे थे, जिससे मुझे और भी मज़ा आ रहा था। मैं जोर-जोर से साँस ले रही थी – “हाँ… हाँ… बस ऐसे ही जानू… ऐसे ही चोदो…”
भाग 6: पचपच और खचपच की आवाज़ों से भरा कमरा
उधर मेरी साड़ी प्रेस हो रही थी और इधर मेरी चूत की चुदाई भी हो रही थी। मेरे पति बीच-बीच में साड़ी प्रेस करना छोड़कर मेरे दोनों चूतड़ अपने दोनों हाथों से फैला लेते थे, फिर अपना पूरा लंड मेरी चूत में जड़ तक धकेल देते थे – जिससे मेरी बच्चेदानी तक लंड की चोट लगती थी। वह चोट दर्द देती थी, लेकिन साथ ही साथ ऐसा सुख भी देती थी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। जब वह मेरे चूतड़ फैलाते थे, तो मेरी चूत और ज्यादा खुल जाती थी और उनका लंड और गहराई तक जा पाता था। फिर वह इस्त्री वापस उठाते और साड़ी को प्रेस करते हुए फिर से अपना लंड धीरे-धीरे चलाने लगते।
इस तरह से चूत चुदाई में मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं अपने आप को रोक नहीं पा रही थी। मेरी चूत ने दो बार पानी छोड़ दिया था। पहली बार तो उन तीन शुरुआती झटकों के बाद ही, और दूसरी बार जब वह लगभग दस मिनट तक लगातार चोदते रहे थे। हर बार जब मैं झड़ती थी, मेरी चूत की दीवारें उनके लंड को और जोर से पकड़ लेती थीं – जैसे उसे अंदर ही रोक कर रखना चाहती हों। और मेरे पति उस पकड़ का बहुत आनंद लेते थे – वह कहते थे कि झड़ते समय मेरी चूत उनके लंड को “चूसती” है। इसके बाद भी पति महोदय मेरी चूत का भोसड़ा बनाने में लगे हुए थे – उन्हें रुकने का नाम नहीं था।
मेरी चूत से जो पानी बहकर नीचे आ रहा था, वह अब मेरी नाभि की तरफ बाहर आकर, जहाँ चूत की दरार खत्म होती है, वहाँ पर बूंद-बूंद टपकने लगा था। मैंने महसूस किया कि कुछ गर्म-गर्म बूंदें मेरी जांघों पर गिर रही हैं और फिर नीचे फर्श पर। मैंने अपना चेहरा थोड़ा झुकाकर नीचे देखा – फर्श पर मेरे चूत के पानी की छोटी-छोटी बूंदों से एक गोल दाग बन गया था। कमरे में मेरे चूत के पानी की मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी – हल्की, मीठी, और बेहद कामुक। उस खुशबू ने पूरे कमरे का माहौल बदल दिया था। अब हवा में सिर्फ सेक्स था, सिर्फ वासना थी, सिर्फ हम दोनों का जुनून था।
भाग 7: चौंकाते हुए झटके और चीखों का सिलसिला
मेरे पति ने अपने आरामदायक चोदने का तरीका अचानक बदल दिया। तभी अचानक से पति महोदय ने मेरी चूत चोदते-चोदते अपना पूरा लंड मेरी चूत से सुपारे तक बाहर निकाल लिया। एक सेकंड के लिए मुझे लगा कि उन्होंने चोदना बंद कर दिया है – मेरी चूत खाली हो गई थी, उसे उनके लंड की गर्मी और मोटाई की कमी महसूस हो रही थी। लेकिन अगले ही पल – “घचाक!” – उन्होंने अपना मूसल लंड फिर से मेरी चूत में अन्दर तक घुसेड़ दिया। एक ही झटके में पूरा लंड – जड़ तक। मेरी बच्चेदानी पर फिर से वह जोरदार चोट लगी।
“आह्ह्ह्ह!” मैं चीख उठी।
अभी मैं संभल भी नहीं पाई थी कि उन्होंने फिर से अपना लंड पूरा बाहर निकाल लिया। मैंने उसकी सुपारी को अपनी चूत के बाहर हवा में महसूस किया – ठंडी हवा मेरी गीली चूत को छू रही थी। और फिर – “घचाक!” – उन्होंने फिर से लंड अंदर डाल दिया। “आह्ह्ह!” मैं फिर चीखी।
उन्होंने इस तरह से मुझे चौंकाते हुए पाँच-छह बार अपना लंड पूरा बाहर निकाला और फिर से मेरी चूत में पेल डाला। हर बार वही ताकत, हर बार वही गहराई, हर बार बच्चेदानी पर वही चोट। हर बार मेरे मुँह से एक तेज चीख निकलती। इतनी तेज कि मुझे डर हो रहा था कि कहीं पड़ोसी सुन न लें – लेकिन उस वक्त मैं खुद पर काबू नहीं रख सकती थी। मेरी चीखें बंद नहीं हो रही थीं।
मेरे पति को यह खेल बहुत पसंद आ रहा था – उनके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी, हालाँकि मैं उन्हें देख नहीं पा रही थी, लेकिन उनके लंड की हरकतों से मैं अंदाज़ा लगा सकती थी। वह मेरी हर चीख का आनंद ले रहे थे। आज न जाने क्या बात हो गई थी कि मेरे पति का लंड मेरी चूत के चिथड़े उड़ा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उनके लंड में कोई अलग ही जान आ गई हो – एक जंगली, बेकाबू, और भूखी जान।
मैं भी मदहोशी में चुदवाते हुए बड़बड़ा रही थी। मेरे मुँह से अनगढ़ शब्द निकल रहे थे – “आआहा चोदो.. मेरी चूत को ऐसे ही चोदो.. हाँ ऐसे ही.. आह.. अपना लंड मेरी चूत में जड़ तक डालो.. आह मेरी बच्चेदानी को कुचल डालो.. मेरी चूत तुम्हारी है.. बस तुम्हारी.. पागल कर दिया तुमने मुझे..”
मैं अपनी ही बातें कर रही थी, अपने ही आनंद में खोई हुई। मुझे नहीं पता था कि मैं क्या कह रही हूँ – बस जो मेरे मन में आ रहा था, वह मेरे मुँह से निकलता जा रहा था। मैं बिल्कुल उसी तरह थी जैसे कोई ड्रग्स लेकर हाई हो जाता है – लेकिन मेरी ड्रग्स मेरे पति का लंड था और मेरी चूत उसका नशा ले रही थी।
भाग 8: साड़ी प्रेस हो गई, अब लावा छोड़ने की बारी
अब तक मेरी साड़ी पूरी तरह प्रेस हो चुकी थी। मेरे पति ने इस्त्री बंद कर दी और साड़ी को बड़े ध्यान से फोल्ड किया – बिल्कुल सही आकार में, जैसे किसी दुकान से निकली हो। फिर उन्होंने ब्लाउज को भी उसके ऊपर रख दिया। मेरे सारे कपड़े अब तैयार थे – एक भी क्रीज़ नहीं, एक भी झुर्रियाँ नहीं। पति महोदय ने कहा – “लो तुम्हारी साड़ी और ब्लाउज प्रेस हो गई। देखो कितनी अच्छी बनी है।”
मैंने उनके पीछे मुड़कर देखा – सच में, साड़ी बिल्कुल नई लग रही थी। उसकी चमक वापस आ गई थी। मैंने हाँफते हुए कहा – “ठीक है… बहुत अच्छी बनी है… अब… अब आप अपना काम पूरा कर लो…”
मेरे पति मुस्कुराए। उन्होंने अपना लंड फिर से मेरी चूत में डाला – इस बार धीरे से, प्यार से। फिर उन्होंने करीब दस जोरदार धक्के मारे – एक के बाद एक, बिना रुके। हर धक्का मेरी बच्चेदानी तक जाता था और हर धक्के के साथ मैं चीखती थी – “आह… हाँ… बस… बस ऐसे ही…” मैं अपने चरम पर पहुँचने वाली थी, लेकिन मैं चाहती थी कि वह पहले झड़ें।
और फिर – उन्होंने अपना लंड एक बार गहराई तक डाला और फिर रुक गए। मैंने महसूस किया कि उनका लंड मेरी चूत के अंदर धड़क रहा है – तेज़-तेज़ धड़कनें, जैसे कोई अलग दिल हो। और फिर – उन्होंने अपना लंड का लावा मेरी चूत में छोड़ दिया। गर्म, गाढ़ा, सफेद वीर्य – जैसे कोई ज्वालामुखी फट रहा हो। एक धार, फिर दूसरी, फिर तीसरी। मैंने उस गर्माहट को अपनी चूत के अंदर भरते हुए महसूस किया। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। मैं भी उनके साथ झड़ गई – एक लंबी, गहरी, रुक-रुक कर आती सिसकारी के साथ। मेरी चूत ने उनके लंड को और जोर से पकड़ लिया – जैसे आखिरी बार अलविदा कह रही हो।
मैंने अपने पति के लंड की सारी गर्मी अपनी चूत में खींच ली। कुछ पल मैं वैसे ही रुकी रही – साँस नहीं ली, हिली नहीं, कुछ नहीं किया। बस उस अनुभव को अपने अंदर समेटती रही। फिर मैंने अपनी गांड को हल्का सा हिलाया – इसका मतलब था कि अब बाहर निकल सकते हैं। मेरे पति समझ गए। उन्होंने धीरे-धीरे अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाला। उसके साथ ही उनका कुछ वीर्य भी बाहर आ गया और मेरी जांघ पर बहने लगा – गर्म, चिपचिपा, और सफेद।
भाग 9: चूत के रस से लथपथ लंड को चूसकर साफ किया
मैंने पीछे मुड़कर अपने पति के लंड को देखा। मेरे पति का लंड मेरे चूत के पानी और उनके अपने वीर्य से पूरा लथपथ हो चुका था। वह पूरी तरह गीला था, चमक रहा था, और उस पर मेरे चूत के रस की हल्की मीठी खुशबू थी। मुझसे रहा नहीं गया – मैं झट से घुटनों के बल बैठ गई। मैंने अपने पति के लंड को अपने हाथों में लिया और उसे देखा – ऊपर से नीचे तक, सुपारे से लेकर अंडों तक, सब कुछ मेरे चूत के रस में सना हुआ था।
मैंने उनका लंड अपने मुँह में ले लिया। आह – क्या मस्त स्वाद था। मेरे ही चूत के रस और उनके वीर्य का मिला-जुला स्वाद – हल्का नमकीन, हल्का मीठा, और बिल्कुल अद्भुत। मैं अपने पति का चूत-रस से लिपटा हुआ लंड पूरा अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। मैंने उसे साफ करने का बीड़ा उठाया था – और मैं उसे बखूबी कर रही थी। मैंने अपनी जीभ से उनके लंड की हर इंच को साफ किया – सुपारे के आसपास, शाफ्ट के ऊपर-नीचे, नसों के बीच, और यहाँ तक कि अंडों को भी। मैं उनके लंड को चूसते हुए अपनी आँखें बंद किए हुए थी – मैं उस स्वाद का आनंद ले रही थी। मेरे पति ने मेरे बालों में हाथ फेरा – प्यार से, थकावट भरे हाथों से। कुछ ही देर में मैंने उनके लंड को पूरी तरह साफ कर दिया – वह अब फिर से मुलायम और साफ था, जैसे अभी-अभी नहाया हो।
मैं उठी – मेरे घुटनों में दर्द था, मेरी पीठ में खिंचाव था, मेरी चूत में हल्की जलन थी। लेकिन मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी।
भाग 10: शादी में जाना था, पर मज़ा दोहरा हो गया
अब मेरे पति ने मुझे उठाकर खड़ा कर दिया। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और अपने सीने से लगा लिया। मैंने उनकी गर्दन पर अपना चेहरा रख दिया। उनके शरीर से पसीने की हल्की महक आ रही थी – वह महक जो हमेशा चुदाई के बाद आती है। मैं उस महक की दीवानी हूँ।
फिर उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और मेरे नरम मुलायम होंठों को अपने होंठों में ले लिया। उन्होंने मेरे होंठों को चूसना शुरू कर दिया – धीरे-धीरे, प्यार से। उनके होंठ मेरे होंठों पर थे, उनकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। हमने पाँच मिनट तक चुम्बन किया – बिना किसी जल्दी के, बिना किसी भूख के। बस प्यार से। यह चुम्बन हमारी चुदाई का परफेक्ट एंडिंग था।
पाँच मिनट बाद हम अलग हुए। हम दोनों के होंठ सूज गए थे, हम दोनों के चेहरे पर पसीना था, लेकिन हम दोनों के चेहरे पर वह संतुष्टि थी जो सिर्फ अच्छी चुदाई के बाद आती है।
मैंने कहा – “शादी में भी जाना है यार। देख लो, अब तैयार होने में देर हो जाएगी।”
मेरे पति हँसे – “तुम्हें तो आदत सी हो गई है न? साड़ी प्रेस करवाने का बहाना बनाकर चुदाई करवा लेती हो।”
मैंने भी हँसकर कहा – “आपने खुद शर्त रखी थी। मैंने क्या किया?”
सच कहूँ तो अब तो हम दोनों को ऐसा करने की आदत सी हो गई है। जब भी मुझे कोई साड़ी या ड्रेस प्रेस करवानी होती है, मैं अपने पति से कहती हूँ। और वह मुझसे कहते हैं – “तैयार रहना, कुतिया बनकर।” और मैं तैयार हो जाती हूँ। क्योंकि मुझे यह पसंद है। मुझे यह पसंद है कि मेरे पति मुझे कुतिया बनाकर मेरी चूत चोदते हैं – और मैं उनकी कुतिया बनकर उनसे चुदवाती हूँ। यह हमारा प्यार है, हमारी वासना है, हमारा अपना तरीका है एक-दूसरे को जताने का। साड़ी प्रेस करवाते हुए चुदाई अब हमारी रूटीन का हिस्सा बन चुकी है – और मुझे उम्मीद है कि यह हमेशा बनी रहेगी। हम शादी में तो गए, लेकिन उस दिन का असली मज़ा तो साड़ी प्रेस करते हुए आया था – एक साथ दो काम, और दोनों में पूरा आनंद।