शादी की सालगिरह पर गांड की चुदाई – मेरी शादी की सालगिरह थी और हम दोनों पति-पत्नी बहुत उत्साहित थे। रात भर चुदाई के बाद भी सुबह पतिदेव मुझसे पहले उठ गए थे, लेकिन असली मज़ा तो रात को आना था क्योंकि शादी की सालगिरह पर गांड की चुदाई का वादा था। मेरी कुंवारी गांड आज अपनी सील खोने वाली थी, और उस पहली बार के दर्द और सुख की कहानी आज मैं आपको बताने जा रही हूँ। अगर आप भी गांड चुदाई, पहली बार गांड में लंड और दर्द भरी सेक्स कहानियाँ पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह कहानी आपको ज़रूर पसंद आएगी।
भाग 1: सालगिरह की सुबह और बढ़ती बेचैनी
जब मेरी शादी की सालगिरह थी, हम दोनों पति-पत्नी बहुत उत्साहित थे। पूरे एक महीने से हम इस दिन की तैयारी कर रहे थे। मैंने नई साड़ी खरीदी थी, पति ने मेरे लिए गहने और परफ्यूम लाए थे। खास बात यह थी कि इस बार की सालगिरह पर हम कुछ नया करने वाले थे – कुछ ऐसा जो हमने आज तक कभी नहीं किया था। मेरे पति 3 महीने से मुझे मना रहे थे कि आखिरकार हमारी शादी की सालगिरह पर मैं उन्हें मेरी गांड चोदने की इजाजत दूं। मैं डरती तो थी, लेकिन पति के प्यार और उनकी बातों ने धीरे-धीरे मेरा डर कम कर दिया था। मैंने सोचा, चलो देखते हैं कि गांड की चुदाई में ऐसा क्या खास है जिसके लिए पतिदेव इतने बेचैन रहते हैं।
रात भर चुदाई के बाद भी सुबह पतिदेव मुझसे पहले उठ गए थे। रात में हमने दो बार चूत की चुदाई की थी, लेकिन अभी तक गांड का वादा अधूरा था। जब मैं उठी तो देखा कि वो नहाकर सिर्फ अंडरवियर में ही कमरे में घूम रहे थे। उनका गठीला शरीर, चौड़े कंधे और उभरती हुई मांसपेशियाँ मुझे बहुत आकर्षक लग रही थीं। मैं सोच ही रही थी कि मैं कैसे उन्हें टीज़ करूँ, तभी उन्होंने मुझे बिस्तर पर ही पकड़ लिया। उठते ही उन्होंने मेरे गाल पर एक लम्बा सा चुम्मा दिया – इतना लंबा और गहरा कि मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
मैं भी फ्रेश होकर नहाने चली गई। नहाते समय मैंने बहुत सारा तेल लगा और अपनी त्वचा को मुलायम बनाया। मुझे पता था कि आज रात मेरे शरीर को बहुत सहना पड़ेगा, इसलिए मैंने पूरी तैयारी की। नहाने के बाद मैंने सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहना – ब्रा और पेंटी भी नहीं पहनी थी। मैं चाहती थी कि जब भी पतिदेव मुझे छूना चाहें, उन्हें कोई रुकावट न मिले। मेरे बाल अभी भी गीले थे और उनसे पानी टपक रहा था। पानी की बूंदें मेरे गले से होती हुई मेरे स्तनों पर गिर रही थीं और ब्लाउज के गीले कपड़े से मेरे निप्पल साफ झलक रहे थे।
मैं कपड़े बदलने के लिए अलमारी के पास खड़ी थी कि पतिदेव ने पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया। मैं उनसे छूटने का झूठा विरोध कर रही थी, लेकिन असल में मैं चाहती थी कि वो और कसकर पकड़ें। उन्होंने मेरा ब्लाउज निकाला तो मैंने कोशिश भी नहीं की। ब्लाउज निकालने के बाद उन्होंने मेरे पेटीकोट का नाडा भी खोल दिया और अब मैं पूरी तरह नंगी थी – गीले बाल, चिपचिपी त्वचा, और दूध से भरी हुई चूचियाँ। मैं आईने में अपना प्रतिबिंब देख सकती थी – एक पूर्ण नग्न स्त्री जो अपने पति की बाहों में थी।
वो मेरे गले पर बार-बार चूम रहे थे, हर बार एक नई जगह पर। उनके होंठ मेरी गर्दन की नसों पर घूम रहे थे। उन्होंने बारी-बारी से मेरे दोनों कानों के लोच को अपने मुँह में लिया और धीरे-धीरे चूसा। मेरे पूरे शरीर में एक अलग ही ऊर्जा का संचार हो गया था। मेरा मन कर रहा था कि मैं उन्हें वहीं फर्श पर लिटा दूं और उनका लंड अपनी चूत में ले लूं, लेकिन तभी कमरे का गेट बजा।]
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भाग 2: परिवार के साथ सालगिरह और रात का इंतज़ार
हमें चाय के लिए बुलावा आया था। पतिदेव ने तुरंत जवाब दिया – “5 मिनट में आते हैं।” मैंने अपने कपड़े पहनने की जल्दबाजी की। मैंने वह साड़ी पहनी जो मेरी सास ने मुझे सालगिरह के तोहफे में दी थी – लाल रंग की, सोने की जरी वाली, बिल्कुल शादी वाली साड़ी की तरह। जैसे ही मैंने वह साड़ी पहनी, पतिदेव मुझे बहुत देर तक निहारते रहे। उनकी आँखों में वही चमक थी जो शादी के दिन देखी थी। उन्होंने मेरे करीब आकर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और धीरे-धीरे चूमने लगे। उनकी जीभ ने मेरे होंठों को खोला और अंदर प्रवेश किया।
तभी मेरी सास की आवाज़ आई – “बेटा, चाय ठंडी हो रही है!” हम तुरन्त ही चाय पीने के लिए हॉल में गए। हॉल में जाते ही मेरी सास ने हम दोनों के गालों पर चुम्मा दिया और हमें सालगिरह मुबारक कहा। हमने भी सास-ससुर के पैर छुए और आशीर्वाद लिया। घर के बाकी सदस्यों ने भी हमें विश किया। मेरे साले ने कहा, “भाभी आज तो बहुत खूबसूरत लग रही हो।” मैं शरमा गई।
चाय पीते हुए मैं सोच रही थी कि कैसे दिन भर इंतज़ार करूंगी। पतिदेव की नज़रें बार-बार मुझ पर टिक रही थीं। जब भी हमारी नज़रें मिलतीं, वो मुस्कुरा देते और मैं अपनी नज़रें झुका लेती। दिन भर घर में मेहमान आते रहे, केक कटा, तोहफे मिले, फोटो सेशन हुआ – पर मेरा मन तो बस रात के इंतज़ार में था। मैं सोच रही थी कि आज मेरी दूसरी सील टूटने वाली है – मेरी कुंवारी गांड आज अपना कौमार्य खोने वाली थी।
मेरे पतिदेव 3 महीने से मुझे इसके लिए मना रहे थे। वो मेरी कुंवारी गांड की बहुत तारीफ करते हैं। वो कहते हैं कि मेरी गांड बिल्कुल सेब की तरह गोल, मुलायम और चिकनी है। जब भी मैं जींस पहनती हूँ, वो मेरी गांड को देखते रहते हैं। मैंने भी अपनी गांड की अच्छी सफाई करके रखी थी ताकि आज मैं उनको अच्छे से दे सकूँ। आज उनकी वो तमन्ना पूरी होने वाली थी।
भाग 3: रात का जश्न – सुहागरात जैसा एहसास
रात आने पर हमने बेबी को सुला दिया। बेबी 1 साल का था, उसे सुलाने में थोड़ा टाइम लगा क्योंकि वो आज बहुत चिड़चिड़ा रहा था। शायद उसे भी पता था कि आज उसके मम्मी-पापा बिजी रहने वाले हैं। जब वो गहरी नींद में सो गया, तो मैंने अपने कमरे की तरफ रुख किया।
मैंने वही साड़ी पहनी जो मैंने सुहागरात पर पहनी थी – नीले रंग की, चांदी के काम वाली, बिल्कुल नई जैसी। पर इस बार मैंने कोई गहने नहीं पहने। मैं चाहती थी कि मैं बिल्कुल सादी रहूँ – सिर्फ साड़ी, सिर्फ मैं, और मेरे पति। दूध का गिलास मैं पहले ही कमरे में ले आई थी। पतिदेव ने बिस्तर पर गुलाब के फूल बिखेर दिए थे – लाल, गुलाबी, सफेद – पूरा बिस्तर फूलों से ढका हुआ था। कमरे में उन फूलों की खुशबू इस तरह फैल रही थी मानो कोई बगीचा हो।
थोड़ी देर बाद पतिदेव भी कमरे में आए। वो ताज़ा नहाकर आए थे, उनके शरीर से चंदन और गुलाब की महक आ रही थी। उन्होंने सिर्फ एक लुंगी बाँधी थी, ऊपर से कुछ नहीं। उनकी छाती पर बाल घने थे और पेट पर मांसपेशियों की रेखाएँ साफ दिख रही थीं।
सच कहूं तो मुझे बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे यह मेरी पहली सुहागरात हो। और बेशक, यह मेरी पहली सुहागरात ही थी – आज मेरी सील जो टूटने वाली थी, लेकिन गांड की। चूत की सील तो सुहागरात की रात ही टूट चुकी थी। आज गांड की बारी थी। मेरे मन में भी वही सब भावनाएँ आ रही थीं – थोड़ा डर, थोड़ी खुशी, थोड़ी गुदगुदी, थोड़ी बेचैनी। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था और मेरे हाथ थोड़े काँप रहे थे।
भाग 4: चूत की चुदाई – पहले का मुकद्दमा
अब टाइम ज्यादा नहीं लूँगी। पतिदेव मेरे पास आए और उन्होंने मुझे किस करना शुरू कर दिया। मैं भी उनका साथ देने लगी। उनके होंठ पहले मेरे होंठों पर थे, फिर धीरे-धीरे मेरी ठुड्डी, गला, कंधे – और फिर वापस होंठों पर। चुम्बन करते-करते उन्होंने मेरे सारे कपड़े उतार दिए। उन्हें मुझे नंगी करने की बहुत जल्दी रहती है – सुहागरात को भी उन्होंने तुरंत ही मुझे नंगा कर दिया था। मेरी साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट – सब एक-एक करके जमीन पर गिर गए। अब मैं पूरी तरह नंगी थी।
मैंने भी उनकी लुंगी खोल दी और फिर उनकी बनियान निकाल दी। अब हम दोनों पूरी तरह नंगे थे – त्वचा से त्वचा, दिल से दिल। उनका गर्म शरीर मेरे ऊपर था और मैं उनके नीचे सिकुड़ रही थी।
वो मेरे दोनों चूचियों को हाथ में लेकर मसलने लगे। मेरे मम्मे बहुत बड़े नहीं थे – लगभग 34B – लेकिन वो बहुत संवेदनशील थे, खासकर जब मैंने अभी-अभी बच्चे को दूध पिलाया था। दूध अभी भी मेरे स्तनों में था, और पतिदेव के जोर से दबाने पर मेरे निप्पल से दूध की हल्की धार निकलने लगी। सफेद दूध की बूंदें मेरे पेट और छाती पर गिर रही थीं।
कुछ देर तक ऐसे ही मम्मे मसलने के बाद उन्होंने दूध की उन धारों को अपनी जीभ से चाट कर साफ कर दिया। उनकी गर्म जीभ मेरी त्वचा पर घूम रही थी, मानो कोई भूखा बच्चा दूध पी रहा हो। इससे मेरा पूरा पेट और स्तन चिपचिपा हो गया था – दूध और उनकी लार का मिश्रण। फिर पति मेरे दोनों चूचियों को चूसकर दूध पीने लगे। उन्होंने बारी-बारी से दोनों निप्पलों को मुँह में लिया, धीरे-धीरे चूसा, और बीच-बीच में निप्पल को हल्का सा काटा भी। जब उनके दाँत मेरे निप्पल पर पड़ते, मैं सिहर उठती और मेरी चूत में पानी आ जाता।
दस मिनट तक उन्होंने मेरा दूध पीने के बाद मैंने ही उन्हें हटाया, क्योंकि मुझे अब सब्र नहीं हो रही थी। मैं चाहती थी कि वो मेरी चूत चाटें – क्योंकि उसके बाद ही गांड की बारी आती। मैंने उनका सिर पकड़कर सीधे अपनी चूत पर लगा दिया। अब वो मेरी चूत चाट रहे थे।
उन्होंने पहले मेरी चूत के बाहरी होठों को चाटा, फिर उन्हें अपने होंठों के बीच दबाकर चूसा। फिर उनकी जीभ मेरी क्लिटोरिस पर घूमने लगी – गोल-गोल, ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ। मैं पागलों की तरह कराह रही थी। उनके हाथ उसी समय मेरे स्तनों को मसल रहे थे। मैं झड़ने के कगार पर थी।
जब मैं झड़ने के बिल्कुल करीब पहुँची, तो मैंने उन्हें अलग कर देना चाहा, लेकिन उन्होंने मेरी चूत को और जोर से चूसना शुरू कर दिया। उनकी जीभ मेरी क्लिटोरिस पर और तेज़ी से घूमने लगी। आधा मिनट बाद ही मेरा पूरा शरीर अकड़ने लगा, मेरी जाँघें काँपने लगीं, और मेरी चूत ने गर्म-गर्म रस छोड़ दिया। वो सारा रस पी गए – गटक-गटक कर। उन्होंने मेरी चूत को पूरी तरह साफ कर दिया, जैसे कोई थाली साफ करता है।
भाग 5: गांड की तैयारी – पहली बार का दर्द
सारा रस चाटने के बाद उन्होंने ताकत से एक उंगली मेरी गांड में डाली। मुझे हल्का सा दर्द हुआ – ऐसा लगा जैसे कोई सुई चुभो रहा हो। मैंने चादर पकड़ ली और अपने दाँत भींच लिए। पर एक गुदगुदी भी हो रही थी – एक अजीब सा एहसास जो दर्द और सुख के बीच का था। मेरी धड़कनें तेज़ हो गई थीं और उत्तेजना में मेरी गांड भी ऊपर उठ गई थी।
फिर वे मेरी नाभि को चाटने लगे। 7-8 महीने बाद कोई मेरी नाभि चाट रहा था – और वो भी मेरे पति। मेरी नाभि बहुत संवेदनशील है, और उनकी जीभ की हर हरकत मेरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ रही थी। सच में इतना मज़ा आ रहा था कि मैं भूल गई कि आगे क्या होने वाला है। जब वो हटने लगे तो मैंने फिर उनका सिर पकड़कर नाभि चाटने के लिए कहा। थोड़ी देर और उन्होंने मेरी नाभि चाटी।
कुछ देर नाभि चाटने के बाद जब हटे, तो मैं बैठ गई। उन्होंने मुझे फिर बिस्तर पर लिटा दिया। उन्होंने मेरे दोनों हाथों की उंगलियों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं, और फिर अपना लंड मेरे मुँह के पास ले आए। मैं उसे आइसक्रीम की तरह चूसने लगी – धीरे-धीरे, प्यार से, ऊपर से नीचे तक। उनका लंड बहुत बड़ा है – पूरे 8 इंच का और मोटाई लगभग 2.5 इंच। जब मैं उसे चूस रही थी, तो वह मेरे मुँह में और भी सख्त होता जा रहा था।
कुछ देर ऐसे ही चूसने के बाद वो अब मेरा मुँह चोदने लगे। उन्होंने मेरे सिर को अपने हाथों में जकड़ लिया और धक्के मारने शुरू कर दिए – अंदर, बाहर, अंदर, बाहर। उनका लंड मेरे गले तक जा रहा था। मेरी आँखों में पानी आ गया था, लेकिन मैंने रुकने नहीं दिया। 3-4 मिनट में ही उनका लंड पूरी तरह तैयार हो गया।
अब मैं भी बहुत गर्म हो गई थी। उन्होंने भी मेरी हालत समझते हुए लंड को चूत में डालने में देरी नहीं की। उन्होंने मेरी दोनों पैरों को अपने कंधे पर रख लिया। मेरी चूत पूरी खुली हुई थी, गीली और चमकती हुई। 3-4 झटकों में ही उन्होंने अपना पूरा लंड मेरी चूत की दीवार को चीरता हुआ अंदर डाल दिया। उसका सुपारा मेरी बच्चेदानी से जा टकराया। और फिर पूरे कमरे में “थप-थप-थप” की आवाज़ गूंजने लगी। मेरे मुँह से भी “आह-आह-उफ्फ” की आवाज़ें निकल रही थीं और मैं दोनों हाथों से चादर को जोर से खींच रही थी।
5 मिनट ऐसे ही चोदने के बाद उन्होंने मुझे किस करना शुरू कर दिया और साथ में मेरे दूध भी पी रहे थे। फिर उन्होंने मेरा एक पैर अपने कंधे पर रखा और दूसरा पैर फैलाकर धक्के लगाने लगे। उनका लंड हर धक्के के साथ मेरी बच्चेदानी से टकरा रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अंदर आग लगी हो।
10 मिनट की चुदाई के बाद मेरा पूरा बदन अकड़ने लगा। मैंने चादर छोड़ उनके हाथों को पकड़ लिया और 1 मिनट में ही मेरी चूत ने फिर से पानी छोड़ दिया। इस बार और भी ज्यादा – मेरे रस ने उनकी जांघों और बिस्तर को गीला कर दिया। पानी छोड़ते ही मैं थोड़ी ढीली पड़ गई और पतिदेव ने भी धक्के लगाना रोक कर मुझे किस करना शुरू कर दिया और फिर मेरा मुँह चोदने लगे।
तभी अचानक पतिदेव बोले – “तैयार हो जाओ! अब गांड की बारी है।”
भाग 6: गांड की चुदाई – दर्ज से भी परे
और उन्होंने मुझे फर्श पर बिस्तर के सहारे घोड़ी बना दिया। मैंने बिस्तर की चादर को तुरंत भींच लिया – इतनी जोर से कि मेरी पोरें सफेद पड़ गईं। तभी पतिदेव हँसते हुए बोले, “अभी से इतना डर रही हो तो गांड फाडूंगा तब क्या करोगी?” मैं कुछ नहीं बोली। मैं डर से पत्थर हो गई थी।
वे अपना लंड मेरी गांड में फँसाने लगे। मैंने अपनी गांड को जितना हो सके ढीला छोड़ दिया, पर लंड अंदर जा नहीं पा रहा था – मेरी गांड बहुत तंग थी। तो उन्होंने मेरी गांड में उंगली डालकर छेद को बड़ा करने लगे। पहले एक उंगली, फिर उंगली निकाली और एक साथ 2 उंगलियाँ घुसा दीं। मुझे दर्द तो हो रहा था, पर मैं चुप थी।
जब छेद थोड़ा खुल गया तो उन्होंने लंड फँसाया। कुछ हिस्सा अंदर गया – लगभग दो इंच। मुझे तेज़ दर्द होने लगा। मैंने अपने होंठ काट लिए। उन्होंने लंड को बाहर निकाला और फिर उंगली डालकर छेद को बड़ा करने लगे। कुछ देर ऐसे ही करने के बाद उन्होंने फिर लंड अंदर घुसाया। इस बार उनका आधा लंड अंदर चला गया – लगभग 4 इंच।
मेरे चेहरे की तो हवाइयाँ उड़ गई थीं। इतना दर्द हो रहा था कि मैं चिल्लाना चाहती थी, पर मैंने चादर अपने मुँह में दबा ली थी। अगर मैंने चादर मुँह में नहीं ली होती तो पूरे घर में मेरी चीख पहुँच जाती। मेरे पूरे बदन में सनसनी फैल गई थी। मेरी आँखों से पानी आने लगा था – पहले हल्की नमी, फिर आंसू की बूंदें।
और फिर उनके एक और झटके ने वो बूंदें आंसुओं की धार में बदल दीं – जब उनका पूरा 8 इंच का लंड मेरी गांड में पूरी तरह समा गया। मैं चुपचाप रो रही थी – सिसकियाँ भर रही थी – कोई आवाज़ नहीं, सिर्फ आँसू और काँपता हुआ शरीर।
दर्द के मारे मैं तड़पने लगी और छुटने की कोशिश की। मैं सफल भी रही – मैंने उन्हें धक्का दिया और उनसे दूर हट गई। पर कब तक दूर रहती? मैं जानती थी कि मना करने का कोई फायदा नहीं था। मैं खुद भी यह चाहती थी – चाहे दर्द ही क्यों न हो।
अब मेरी गांड का छेद खुल चुका था, तो पतिदेव का लंड कुछ देर से ढीला पड़ गया था। मैंने उनका लंड चूसना शुरू कर दिया – उसे फिर से सख्त करने के लिए। मैंने बहुत देर तक उनका लंड चूसा – ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर, और हर बार जोर से चूसते हुए। और अब मेरी गांड का दर्द भी कम हो चुका था – हाँ, दर्द अब भी था, पर उतना तीखा नहीं।
जब उनका लंड पूरी तरह सख्त हो गया, तो उन्होंने मुझे फिर से घोड़ी बनाया। इस बार मैंने पहले ही चादर अपने मुँह में दबा ली थी, क्योंकि मैं जानती थी कि गांड का छेद खुलने के बाद पतिदेव मुझे एक वहशी की तरह ही चोदेंगे।
और ऐसा ही हुआ। उन्होंने इस बार एक ही झटके में पूरा लंड मेरी गांड में उतार दिया और धक्के लगाने शुरू कर दिए। “थप-थप-थप” की आवाज़ अब गीली और भारी थी, क्योंकि मेरी गांड में भी अब पानी आ चुका था।
उनके लंड की रगड़ से दर्द के साथ-साथ एक अजीब सा मज़ा भी आ रहा था। मैंने सोचा नहीं था कि गांड की चुदाई भी इतनी हसीन हो सकती है – इतना मीठा दर्द देती है। लेकिन वह मीठा दर्द थोड़ी ही देर के लिए था।
अचानक उन्होंने धक्के लगाना बंद कर दिए और मुझे बिस्तर पर फिर से घोड़ी बना दिया। और इस बार तो उन्होंने पूरी ताकत के साथ जोरदार धक्के लगाना शुरू कर दिए। पर इस बार वह हसीन दर्द नहीं था – यह सिर्फ दर्द था, तीखा, गहरा, असहनीय दर्द।
दर्द के मारे मेरी हालत खराब होती जा रही थी। मेरी पकड़ भी कुछ ढीली पड़ती जा रही थी। मैं सोच रही थी, कब खत्म होगा यह सब।
5 मिनट बाद फिर अचानक उन्होंने धक्के लगाना बंद कर दिए। मुझे थोड़ी राहत मिली। मैं फिर उनका लंड चूसने लगी – उसे शांत करने के लिए, या खुद को शांत करने के लिए, मुझे नहीं पता।
कुछ देर बाद उन्होंने पोज़ बदला। इस बार उन्होंने मुझे कुतिया बनाकर चोदा – यानी मुझे चारों पैरों पर खड़ा किया, और पीछे से धक्के लगाए। इस आसन में मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था, क्योंकि लंड आसानी से पूरा मेरी गांड में समा रहा था। मेरी दर्द भरी सिसकारियाँ निकलना जारी थी – “आह… उफ्फ… हाय…”
थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर पोज़ बदला। उन्होंने मुझे गोदी में बैठा लिया – मैं उनकी गोद में बैठी, और उनका लंड मेरी गांड में फँसा हुआ था। वो बिस्तर पर बैठ गए और मेरा दूध पीने लगे। मैं उनकी पीठ सहला रही थी और धीरे-धीरे अपने हिप्स हिला रही थी – उनके लंड को अपनी गांड में महसूस करते हुए।
भाग 7: आखिरी पोज़ और जोरदार समापन
कुछ देर ऐसे ही दूध पीने के बाद वो फिर खड़े हुए। उनका एक हाथ मेरी कमर पर था और दूसरा हाथ मेरे चूतड़ पर। मैंने भी उन्हें अपनी टांगों से जकड़ लिया – कसकर, मजबूती से। मेरे हाथ उनके कंधों पर थे। यह मेरी और मेरे पतिदेव की सबसे पसंदीदा पोज़ है। इसमें हम दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह चिपके होते हैं, आँखों में आँखें डालकर एक-दूसरे को देखते हैं।
एक हाथ से कमर और दूसरे से चूतड़ पकड़कर वो मुझे ऊपर-नीचे करने लगे। पहले धीरे-धीरे, फिर तेजी से। थोड़ी देर बाद वो धक्के लगाने लगे – अब वो मुझे ऊपर-नीचे नहीं कर रहे थे, बल्कि अपनी कमर को आगे-पीछे हिला रहे थे।
ऐसा जब भी करते हैं, मुझे बहुत मज़ा आता है। क्योंकि मैंने उनकी कमर को अपनी टांगों से कसकर जकड़ रखा था, तो वो ताकत से धक्के लगाते थे – जोर से, गहरे, बेरहमी से। इससे मज़ा और भी बढ़ जाता है।
पर अचानक उन्होंने धक्कों की गति तेज़ कर दी – बहुत तेज़। मैं समझ गई कि उनका निकलने वाला है। मैंने अपनी गांड की मांसपेशियों को उनके लंड के चारों ओर कस लिया – उन्हें और अंदर महसूस करने के लिए, उनके निकलने को और तीव्र बनाने के लिए।
2 मिनट बाद ही वो मेरी गांड में झड़ गए। उनका गर्म, गाढ़ा वीर्य मेरी गांड के अंदर फूटा – एक बार, दो बार, तीन बार – जैसे कोई ज्वालामुखी फट रहा हो। वो ढीले होकर हाँफते हुए वहीं बिस्तर पर बैठ गए। उनका लंड अभी भी मेरी गांड में फँसा हुआ था। उनका वीर्य मेरी गांड में से निकलता हुआ उनकी जांघों पर आ रहा था – गर्म, चिपचिपा, सफेद रस।
मैंने भी उन्हें अपनी टांगों से जकड़ रखा था और उनकी पीठ सहला रही थी। वो भी मेरी पीठ को सहला रहे थे और पता नहीं मेरी गांड की तारीफ करते हुए क्या-क्या बड़बड़ा रहे थे – “बहुत टाइट है… कितनी अच्छी है… सोना है तेरी गांड…”
मुझे भी गांड में एक हसीन दर्द और जलन दोनों हो रहे थे। मैं थक गई थी, दर्द से बेहाल थी, पर अंदर से एक गहरी तृप्ति थी – एक पूर्णता का अहसास।
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भाग 8: उस रात के बाद
उस रात उन्होंने 4 बार मेरी गांड मारी। हाँ, 4 बार। इतनी बेरहमी से कि मुझे लगा कि कभी मिलूंगी ही नहीं – या फिर वो कोई दुश्मनी निकाल रहे हों। हर बार उन्होंने कोई नया पोज़ इस्तेमाल किया, हर बार और भी जोर से, और भी गहराई तक। आखिरी बार तो मैं बेहोश होने की कगार पर थी।
सुबह उठी तो मेरी गांड बहुत बुरी तरह सूज रही थी। इतना दर्द था कि मैं ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थी। मुझे ठीक होने के लिए 4-5 दिन तक दवाई लेनी पड़ी – दर्द की दवा, सूजन की दवा, और एक मरहम भी।
लेकिन उसके बाद, जब मैं ठीक हो गई, तो मैंने अपने पति से कहा – “एक बार और।” और उन्होंने मुझे फिर चोदा। और फिर। और फिर।
आज वे जब भी मेरी गांड मारने की कहते हैं, तो मैं उछल-उछल कर गांड मरवाती हूँ। सच में उस दिन मैं भी उन खुशनसीब औरतों में शामिल हो गई जिन्होंने अपने पति से ही चूत और गांड – दोनों की सील खुलवाई।
एक बात और कहूँ तो – गांड मरवाने के बाद मुझे सच में एक पूर्ण औरत होने का अहसास हुआ। अब मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं लगती। मेरा शरीर, मेरी इच्छाएँ, मेरा प्यार – सब कुछ पूरा है। और यह सब मेरे पति की बदौलत है।
अब हमारी शादी को 8 साल हो चुके हैं, और हम आज भी उसी जोश और प्यार के साथ एक-दूसरे को चोदते हैं – चाहे चूत हो या गांड। क्योंकि असली प्यार वही है जो बेडरूम से शुरू होता है और उसी में खत्म नहीं होता।