मेरी पत्नी यही तो चाहती थी –बेरहम गांड मारने की कहानी

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मेरी पत्नी यही तो चाहती थी – क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई पत्नी खुद ही अपने पति से उसे रुलाने और बेरहमी से चोदने की गुहार लगाए, तो उस रात का सेक्स कितना जंगली और यादगार हो सकता है? यह कहानी सिर्फ चुदाई की नहीं, बल्कि एक ऐसी रात की दास्तान है जहाँ मेरी पत्नी यही तो चाहती थी – बेरहमी से गांड मारना, चूत चोदना, मुँह में लंड डालना और रुला देना। अगर आप मेरी पत्नी यही तो चाहती थी जैसी हार्डकोर एनल सेक्स, थप्पड़ और पिटाई वाली रफ सेक्स, और सबमिसिव पार्टनर की धमाकेदार हिंदी सेक्स कहानियाँ ढूंढ रहे हैं, तो दीपशिखा और प्रदीप की यह दास्तान आपके लिए ही है।

भाग 1: शादी के 7 साल – प्यार, चुदाई और एक समस्या

मेरा नाम प्रदीप है और मैं 27 वर्ष का हूँ। मेरी पत्नी का नाम दीपशिखा है – हम दोनों की उम्र एक जैसी है, 27 साल। लेकिन उम्र में समानता के बावजूद, दीप का शरीर किसी परी से कम नहीं है। मेरी पत्नी भरे हुए और कामुक बदन की मालकिन है – उसके 34 साइज़ के मोटे-मोटे चूचुक, जो हमेशा सेक्स के दौरान पसीने से चमकने लगते हैं, उसकी 36 की चौड़ी और गोल-मटोल गांड, जिसे देखते ही किसी का भी लंड खड़ा हो जाए, और एकदम गोरी, चिकनी और मुलायम त्वचा, जिस पर थप्पड़ का निशान बहुत देर तक रहता है। उसकी कमर पतली है और जांघें मोटी – बिल्कुल वैसा शरीर जैसा हर आदमी अपनी बीवी में चाहता है।

हमारी शादी को 7 वर्ष हो चुके हैं और आज तक हम चुदाई का दिल से आनंद लेते हैं। हमारे बीच कोई शर्म-झिझक नहीं है, कोई हिचक नहीं है। मेरी पत्नी सेक्स में एक भयंकर पागल कुतिया की तरह व्यवहार करती है – वो उछल-उछल कर चुदाई का मजा लेती है, मेरे लंड को अपनी चूत और गांड में ऐसे समाती है जैसे वो उसे खा जाना चाहती हो। वो मुझसे पूरी तरह संतुष्ट है और मैं भी उससे। सेक्स के बाद हम एक-दूसरे से लिपटकर सोते हैं और सुबह फिर से वही जुनून।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से मेरी एक बड़ी समस्या थी। एक ऐसी समस्या जिसने मुझे रातों की नींद हराम कर रखा था, जिसने मेरे आत्मविश्वास को चोट पहुंचाई थी। वो समस्या थी – मेरी पत्नी की गांड।

जब मुझे उसकी गांड मारनी होती है, तो वो कुछ न कुछ बहाना करके मुझे बहुत तड़पाती है। ऐसा नहीं है कि उसे गांड मरवाना पसंद नहीं है – बिल्कुल पसंद है। जब कभी हम एनल सेक्स करते हैं, तो वो खूब उछल-उछल कर अपनी गांड मरवाती है, उसके मुँह से ‘आह्ह्ह… और गहरा… गांड फाड़ दो मेरी…’ जैसी आवाजें निकलती हैं, और वो चरम सुख पर इतनी पागल हो जाती है कि बिस्तर हिलने लगता है।

पर अभी कुछ दिनों से उसने मुझे पूरी तरह से गांड मारने से रोक रखा था। मैं समझ नहीं पा रहा था – क्या हुआ उसे? क्या मैंने कुछ गलत किया? क्या उसे दर्द बहुत होता है? क्या वो किसी और के बारे में सोच रही है? हर बार जब मैं गांड मारने की बात करता हूँ, वो एकदम पूरी नंगी तो हो जाती है – उसके चूचुक मेरी छाती से लग जाते हैं, उसकी चूत गीली हो जाती है – लेकिन गांड के पास भी नहीं फटकने देती। वो अपने हाथ से ही मेरा लंड हिला-हिलाकर मेरा पूरा स्खलन कर देती है और फिर नंगी ही वहीं सो जाती है।

हालांकि सेक्स में उसकी रुचि कम नहीं हुई है – सामान्य चूत चुदाई का वो भरपूर मजा लेती और देती है। वो मेरे ऊपर आकर काउगर्ल पोजीशन में इतनी तेजी से झूलती है कि मेरा लंड उसकी चूत से बाहर ही नहीं निकलता। वो मुझसे कहती है – “और चोदो… और गहरा… मेरी चूत का सारा रस निकाल लो…” लेकिन जैसे ही मैं अपना हाथ उसकी गांड की तरफ बढ़ाता हूँ, वो तुरंत सिकुड़ जाती है और मेरा हाथ पकड़ लेती है।

मैं अपनी बीवी के इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था। कई रात मैं उसके सो जाने के बाद अकेले बैठकर सोचता रहा – आखिर वो क्या चाहती है? क्या वो मुझसे ऊब गई है? क्या मैं उसे संतुष्ट नहीं कर पा रहा? मेरे मन में तरह-तरह के सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं था। मैंने कभी उससे सीधे पूछने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं वो और दूर न हो जाए। पर जो होने वाला था, उसने सब कुछ बदल दिया।

भाग 2: व्हाट्सएप का वो संदेश – वो कुछ और ही चाहती थी

वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे यादगार दिन था। मैं ऑफिस में अपनी डेस्क पर बैठा किसी फाइल को घूर रहा था, जब मेरे फोन पर व्हाट्सएप की घंटी बजी। दीपशिखा का मैसेज था। मैंने लापरवाही से खोला – सोचा कोई सामान्य मैसेज होगा। पर जो मैंने पढ़ा, उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मेरे लंड में तुरंत खून दौड़ गया।

उसने लिखा था:

“मैं चाहती थी कि आप मेरी बेरहमी से चुदाई करो। मुझे आज रुला देना। जो करना है सब कर लेना।”

मैंने यह मैसेज तीन बार पढ़ा। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मेरे हाथ काँप रहे थे। इतने दिनों की तड़प, इतने दिनों के सवाल – सब एक पल में खत्म हो गए। मैं समझ गया – ये वो मौका था जिसका मैं इंतजार कर रहा था। ये वो संकेत था जिसकी मुझे आस थी। मेरी पत्नी कुछ और ही चाह रही थी – वो चाहती थी कि मैं उस पर रोब जमाऊँ, उसे काबू में करूँ, उसे रुलाऊँ।

मैंने तुरंत अपने बॉस से छुट्टी माँगी – झूठा बहाना बनाया कि पत्नी की तबीयत खराब है। ऑफिस का काम अधूरा छोड़कर मैं सीधा घर भागा। रास्ते में मैं सोच रहा था – आज उसे ऐसा चोदूँगा कि वो मुझे हमेशा याद रखे। आज उसकी गांड का बैंड बजा दूँगा। आज उसकी सालों की तड़प पूरी कर दूँगा।

घर पहुँचते ही मैंने दरवाजा खटखटाया। दीप ने दरवाजा खोला – वो पूरी तरह तैयार थी। नहीं, कपड़ों में नहीं, बल्कि मानसिक रूप से। उसने लाल रंग का एक टाइट ब्लाउज पहना हुआ था और नीचे सिर्फ एक छोटी सी नायलॉन की पैंटी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों में एक अलग ही चमक थी – एक बेचैनी, एक गुहार, एक पागलपन। उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी, लेकिन आँखों में आँसू थे। वो बोली – “आखिरकार आ गए… बहुत देर कर दी आपने।”

मैंने अंदर कदम रखा ही था कि दीप ने अगला ही पल अपना ब्लाउज और पैंटी उतार फेंके। वो पूरी तरह नंगी हो गई – बिल्कुल वैसे ही जैसे जन्म के समय थी। उसके चूचुक झूल रहे थे, उसकी चूत के बाल साफ थे और उसकी गोरी गांड कमरे की रोशनी में चमक रही थी। वो मेरे पास आई, मेरे गले लिपट गई और मुझे गहरी, बेचैन किस करने लगी।

भाग 3: पहला गले लगना और बेचैन हाथों की शुरुआत

उसके होंठ मेरे होंठों को चूस रहे थे, उसकी जीभ मेरी जीभ से लिपट रही थी। उसने अपने दोनों हाथ मेरे सिर पर रख दिए और मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगी। मेरे हाथ – पता नहीं कब – उसकी चूत और उसके दूध पर पहुँच गए। मेरी उँगलियाँ उसकी चूत के बाहरी हिस्से को सहला रही थीं और मैं महसूस कर सकता था कि वो पहले से ही गीली थी। उसकी चूत की लबिया फूली हुई थी और उनमें से पानी टपक रहा था।

मैंने एक उंगली उसकी चूत के अंदर डाली – अंदर बहुत गर्मी थी, बहुत नमी थी। वो तुरंत कराह उठी – “आह्ह्ह… हाँ… अंदर डालो… और गहरा…” मैंने दो उंगलियाँ कर दीं। उसकी चूत ने मेरी उंगलियों को ऐसे दबोचा जैसे वो उन्हें छोड़ना ही नहीं चाहती। मेरी दूसरा हाथ उसके चूचियों पर था – मैं उन्हें दबा रहा था, उनके निप्पल को अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच रगड़ रहा था। वो निप्पल पहले से ही कठोर हो चुके थे – छोटे-छोटे मोतियों की तरह।

दीप ने धीरे से मेरे कान में कहा – “आज मुझे अपनी कुतिया बना लो… मैं तुम्हारी हूँ… पूरी तरह से…” यह सुनते ही मेरा लंड और सख्त हो गया – इतना कि मेरी जींस में जगह कम पड़ने लगी।

भाग 4: बिस्तर पर 69 – बीस मिनट का अद्भुत खेल

वो मुझे बिस्तर पर लेटाने लगी – मैंने मना कर दिया। मैंने खुद कपड़े उतारे, अपनी शर्ट के बटन एक-एक करके खोले और फिर जींस और अंडरवियर को पैरों तले रौंद दिया। मेरा लंड अब पूरी तरह से खड़ा था – सात इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ और उसके सुपारे पर प्री-कम की बूंदें चमक रही थीं।

दीप ने मेरे लंड को देखा – उसकी आँखों में भूख थी। उसने बिना कुछ कहे मुझे बिस्तर पर लेटा दिया और खुद 69 की पोजीशन में आ गई। उसने मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया – पहले तो सिर्फ सुपारा, फिर धीरे-धीरे पूरा लंड। उसके गर्म, गीले होंठों ने मेरे लंड को चूसा – इतनी कुशलता से, जैसे वो जानती हो कि मुझे सबसे ज्यादा कहाँ मजा आता है। उसकी जीभ मेरे लंड के नीचे की नस पर घूम रही थी और मेरी सांसें तेज़ होने लगी थीं।

मैंने भी अपना मुँह उसकी चूत पर लगा दिया। उसकी चूत से एक सोंधी, कामुक खुशबू आ रही थी – बिल्कुल वैसी ही जैसी मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैंने उसकी चूत चाटना शुरू किया – पहले उसके क्लिट को, फिर उसकी लबिया को, फिर पूरी चूत को। मेरी जीभ उसकी चूत के अंदर और बाहर हो रही थी। हर बार जब मैं उसके क्लिट को चूसता, उसके शरीर में झटका लगता और वो मेरा लंड और जोर से चूसने लगती।

हम लगभग 20 मिनट तक ऐसे ही रहे। इस दौरान दीप दो बार पानी निकाल चुकी थी – पहली बार पांच मिनट में, दूसरी बार दस मिनट में। हर बार उसकी चूत ने ऐसा रस छोड़ा कि मेरा पूरा मुँह भीग गया। मैंने वो सारा रस पी लिया – उसका स्वाद मीठा और तीखा दोनों था। जब मेरा पानी निकलने वाला था – जब मेरे अंडकोष में बिजली सी दौड़ने लगी थी और मेरी कमर झटके ले रही थी – तो मैंने अपना लंड उसके मुँह से बाहर निकाल दिया। मैंने उसे रोक दिया।

भाग 5: रुकना और फिर से शुरू होना – चूचियों को काटना

दीप ने हैरानी से मेरी तरफ देखा – “क्यों रोक दिया? निकलने वाला था न…” मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने उसे अपनी तरफ खींचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसके होठों पर मेरे लंड और उसकी अपनी चूत का मिला-जुलता स्वाद था। हम किस करने लगे – ऐसी गहरी, बेचैन किस कि हमारे दाँत एक-दूसरे से टकरा रहे थे। वो मेरे बालों में हाथ डालकर मुझे किस करने लगी और मैं उसके होठों को चूसता रहा।

किस करते हुए मैं उसके दोनों चूचियों पर टूट पड़ा। मैंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा – वो इतने बड़े थे कि मेरी हथेलियाँ कम पड़ रही थीं। मैंने उन्हें दबाया, मसला और फिर अपना मुँह उन पर रख दिया। मैंने एक चूची को अपने मुँह में लिया और उसे जोर से चूसा – इतना जोर से कि उसका निप्पल मेरे मुँह की छत से लग गया। फिर मैंने उसे काटना शुरू किया – पहले हल्के से, फिर ऐसे जैसे मैं उसे चबा रहा हूँ।

दीप पागल हो गई – “आअह्ह… अह्ह्ह… उम्म्म… और काटो… काट के फाड़ दो ना… यही चाहिए मुझे…” उसकी आवाज़ में दर्द और सुख दोनों थे। मैंने उसके दूसरे चूची पर हमला किया – इस बार और जोर से। मेरे दांत उसके निप्पल में धंस गए और मैंने उसे ऐसे खींचा जैसे वो रबर का टुकड़ा हो। दीप ने मेरे बाल और जोर से खींचे – “आह्ह्ह… मर गई… मर गई मैं… अब और नहीं…”

कुछ मिनट तक ऐसे ही सब चलता रहा। मैंने उसके दोनों चूचियों पर काटने के निशान बना दिए थे। वो पूरी तरह बदहवास हो चुकी थी – उसके बाल बिखरे हुए थे, उसके होंठ सूख गए थे, उसके शरीर पर पसीना आ रहा था। तभी दीप बोली – “अब रहा नहीं जाता… प्लीज… अब चोदो मुझे… चूत चूस चूस के बेहाल कर दिया… मेरी चूत में आग लग गई है… बस अब लंड अंदर डालो…”

लेकिन मैं कहाँ मानने वाला था। मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी। मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया, उसकी जांघें खोल दीं, और फिर से उसकी चूत पर अपना मुँह लगा दिया। इस बार मैं और तेज़ था, और ज़्यादा बेरहम। मेरी जीभ उसके क्लिट पर तेज़ी से घूम रही थी – गोल-गोल, ऊपर-नीचे, बाएँ-दाएँ। मैंने दो उंगलियाँ उसकी चूत के अंदर डाल दीं और उन्हें ऐसे घुमाया जैसे ड्रिल मशीन चला रहा हूँ।

दीप को और भी ज्यादा आनंद आने लगा। उसकी जांघें काँपने लगीं, उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और वो बिस्तर पर तड़पने लगी। वो कराह रही थी – “आह्ह्ह… माआ… हो गया… हो गया… अब झड़ जाऊँगी…” इस बार तो वो 3-4 मिनट में ही झड़ गई – उसके शरीर में ऐसे झटके आए कि वो बिस्तर पर उछल पड़ी और उसकी चूत से पानी की धार फूट पड़ी। सारा पानी मेरे मुँह और चेहरे पर आ गया। मैंने उसे पी लिया।

भाग 6: गिड़गिड़ाहट, थप्पड़ और जबरदस्ती मुँह चोदना

अब दीप सच में गिड़गिड़ाने लगी। उसकी आवाज में रोने की सी आवाज थी – “प्लीज… प्लीज मत तड़पाओ ना… मैं तुम्हारी कुतिया हूँ… बस अब एक बार चोद लो… अब मेरी चूत में लंड डाल दो… मैं मर जाऊँगी…”

मैंने ठंडे, कठोर लहजे में कहा – “अभी नहीं मेरी जान… अभी तो मज़ा आना शुरू हुआ है। तुमने इतने दिन मुझे तड़पाया है – आज बारी मेरी है।”

मैं अपना लंड – जो अब भी पूरी तरह सख्त था, उसके सुपारे पर प्री-कम चमक रहा था और नसें उभरी हुई थीं – उसके मुँह के पास ले गया। “खोल मुँह,” मैंने आदेश दिया। उसने अपना मुँह बंद कर लिया और सिर हिलाकर मना कर दिया। उसकी आँखों में डर था – लेकिन एक अजीब सी उत्तेजना भी।

उसके इस इनकार ने मुझे और भड़का दिया। मैंने उसके बाल पकड़ लिए – उसके लंबे, काले, घने बालों को अपनी मुट्ठी में लपेट कर – और उसके दोनों गालों पर लगातार 10-15 जोरदार थप्पड़ लगाए। ‘थप्प… थप्प… थप्प…’ – थप्पड़ों की आवाज़ कमरे में गूंजी। उसका चेहरा एकदम लाल होने लगा। उसकी आँखों में पानी आ गया, लेकिन उसने एक आवाज़ भी नहीं निकाली।

“मैंने कहा – मुँह खोल!” मैंने गरज कर कहा। इस बार उसने धीरे से अपना मुँह खोला। मैंने अपना लंड उसके मुँह में डाल दिया – पूरा एक झटके में, गले तक। वो मेरा पूरा लंड अपने मुँह में नहीं ले सकती थी – लंड उसके गले में फँस रहा था, उसकी साँस रुक रही थी। लेकिन मुझे कोई परवाह नहीं थी।

मैं उसका मुँह चोदने लगा – ऐसे बेरहमी से, जैसे वो सिर्फ एक गुड़िया हो, एक रबर की डॉल। मैं उसके मुँह में अपना लंड अंदर-बाहर कर रहा था – तेज़ी से, जोर से, बिना रुके। उसके मुँह से सिर्फ ‘गुप्पप्प… गुप्पप्प… गुप्पप्प…’ की आवाज़ें आ रही थीं। उसका थूक बाहर टपक रहा था – उसकी ठुड्डी, गाल, गर्दन, सब गीले हो गए थे। उसके लार के साथ मेरे लंड का प्री-कम भी मिल रहा था।

जब भी मेरा लंड उसके मुँह से बाहर आता, मैं उसके दोनों गालों पर जोरदार थप्पड़ मार देता और बोलता – “माँ की लौड़ी… चूस इसे… पूरा मुँह भर के चूस… और गहरा ले अंदर…” वो फिर मेरे लंड को चूसने लगती – अब पूरी तरह समर्पित, पूरी तरह हारी हुई। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वो चूस रही थी।

मुझे इस तरह की हरकत करने में बड़ा मजा आ रहा था। उसके मुँह को चोदते-चोदते लार और थूक हर तरफ फैल गया था। वो थूक मैं उसके मुँह पर ही पोंछ देता और फिर एक और तमाचा मार देता। थप्पड़ खाकर उसका पूरा चेहरा लाल पड़ गया था – उसके गालों पर मेरी उंगलियों के निशान बन गए थे। लेकिन उसके चेहरे पर वो भीषण गर्माहट थी – वो दर्द में भी सुख ढूंढ रही थी।

भाग 7: गाली और उसका नतीजा – उल्टा पटकना और स्केल की पिटाई

जब उसके सब्र की सीमा पूरी तरह टूट गई, तो उसने मुझे गाली देते हुए कहा – “भोसड़ी के… जब चोदना ही नहीं था न… तो इतना गर्म क्यों किया… बस मुँह चोद के मेरा पूरा मुँह फाड़ दिया… चूत चाट के बेहाल कर दिया… लंड दिखा दिखा के मेरा दिमाग खराब कर दिया… अब कर लो जो करना है…”

यह गाली सुनते ही मेरा खून खौल उठा। सिर्फ इतना सुनना था कि मैंने एक सांस में उसके दोनों गालों पर 10-12 थप्पड़ और जमा दिए – इतने जोर से कि उसका सिर एक तरफ से दूसरी तरफ झूलने लगा। उसके मुँह से खून सा आ गया – हल्का सा, लेकिन वहाँ था। फिर मैंने उसके बाल पकड़ कर उसे बिस्तर पर उल्टा पटक दिया। उसके मोटे, गोरे, चिकने चूतड़ अब मेरे सामने थे – बिल्कुल खुले हुए, काँप रहे थे, उन पर पसीना चमक रहा था और बीच में उसकी गांड का छेद – छोटा, टाइट, और अब थोड़ा गीला।

मैंने उस स्केल को उठाया जो मैंने पहले ही बेडसाइड टेबल पर रख छोड़ा था – एक लंबा, सख्त प्लास्टिक का स्केल, जैसा स्कूल में इस्तेमाल होता है। मैंने उस स्केल से उसके दोनों चूतड़ों पर दो बहुत जोर से वार किए। हवा में ‘स्विश… स्विश…’ की आवाज़ हुई और फिर चूतड़ों पर ‘चटाक्… चटाक्…’ की ऐसी आवाज़ हुई जैसे पटाखा फूटा हो। दीप के मुँह से सिर्फ ‘आह्हीईईस्स्स…’ की दबी हुई चीख निकली – जैसे कोई दर्द से दम तोड़ रहा हो। उसके चूतड़ों पर लाल-लाल निशान बन गए – स्केल के पूरे निशान, जो उभर आए थे।

मैंने स्केल को वहीं रख दिया और अपने हाथ से उसके चूतड़ों को सहलाया – वो गर्म हो चुके थे, जल रहे थे। फिर मैंने उसे सीधा किया – उसकी टांगें उठा कर अपने कंधों पर रख लीं – और अपना लंड पूरी ताकत से उसकी चूत के मुंह पर रख दिया। उसकी चूत तो पहले से ही भीगी और तैयार थी – उसका रस उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर पर टपक रहा था। मैंने अपने कूल्हों को एक जोरदार झटका दिया – केवल 3 झटकों में मेरा पूरा सात इंच का लंड उसकी चूत में समा गया।

भाग 8: चूत में लंड – तेज, जोरदार, बेरहम

दीप दर्द से चीखने लगी – “आह्ह्ह्ह्ह्… ऊऊओहह… निकालो इसे बाहर… बहुत तेज दर्द हो रहा है… मेरी चूत फट रही है… प्लीज… प्लीज रुको…” दर्द के मारे उसका पूरा चेहरा लाल पड़ गया था – जितना थप्पड़ों से लाल था, उससे भी ज्यादा। उसकी आँखों से आँसू निकल आए थे – बड़े-बड़े आँसू, जो उसके गालों पर बह रहे थे।

मैंने एक पल के लिए रुक कर उसकी चीख दबाने के लिए उसे जोरदार किस किया – अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी, उसके दाँतों को चूसा, उसके होठों को चाटा। एक मिनट बाद – बस एक मिनट – जब उसकी साँस थोड़ी सामान्य हुई, मैं फिर से तेज झटके देने लगा। पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़, फिर बेरहम।

“प्लीज रुक जाओ… दर्द हो रहा है… तुम तो मुझे मार ही डालोगे…” वो गिड़गिड़ा रही थी, लेकिन मैं पत्थर बन चुका था। मैं उसकी बात अनसुना करता रहा। मैं उसे बेरहमी से चोद रहा था – थप-थप-थप की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी। बीच-बीच में मैं उसके गालों पर तमाचे भी मार रहा था – बाएँ, दाएँ, बाएँ, दाएँ। उसके चेहरे पर एक साथ दर्द, आँसू, और सुख – तीनों के भाव थे।

वो बस ‘आअहह… आह्ह्ह्ह्ह्… माआ… मर गई मैं… उफ्फ… मेरी चूत में आग लग गई…’ जैसी आवाजें निकाल रही थी। लगभग 5 मिनट की तेज़, बेरहम चुदाई के बाद उसका स्खलन हो गया – इस बार इतना जोरदार कि उसकी चूत ने मेरे लंड को ऐसे कस कर दबोचा जैसे वो उसे निगल जाना चाहती हो। उसका पूरा शरीर थरथरा गया – उसकी जांघें काँपी, उसकी उँगलियाँ चादर में गड़ गईं, और उसकी आँखें पीछे की तरफ मुड़ गईं।

झड़ते ही दीप के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था – एक गहरी, संतुष्ट साँस। मैं रुक गया। मैंने अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाला – वो उसके रस और मेरे प्री-कम से भीगा हुआ था, चमक रहा था। फिर मैं झुका और उसके दोनों निप्पल फिर से काटने लगा – अब हल्के से, प्यार से। वो सिर्फ हल्की सिसकारियाँ भर रही थी। उसके चूचियों पर मेरे दांतों के गहरे निशान थे – वो लाल हो गए थे, सूज गए थे।

भाग 9: मेरी पत्नी यही तो चाहती थी – बेरहमी से गांड मारने की शुरुआत

मैंने अपना लंड फिर से उसके मुँह के पास बढ़ाया – सोचा एक बार और मुँह चोद लूँ। लेकिन इस बार उसने मुँह ही नहीं खोला। उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया और अपने होठों को कस कर बंद कर लिया। मैंने एक थप्पड़ मारा – “मुँह खोल!” वो नहीं मानी। मैंने दूसरा थप्पड़ मारा – और भी जोर से। फिर भी नहीं। उसकी आँखों में एक अजीब जिद थी – जैसे वो कह रही हो “अब बस, अब कुछ और करो।”

मैंने उसे पलट कर लिटा दिया – अब वो मेरी तरफ पीठ करके लेटी थी। मैंने उसकी गांड में उंगली डालने की कोशिश की – धीरे से, एक उंगली। लेकिन उसने तुरंत अपनी गांड की मांसपेशियों को कस लिया और मेरी उंगली बाहर निकल गई। “मत करो… दर्द होगा…” उसने कहा।

“नहीं होगा… एक बार कर लेने दे न…” मैंने प्यार से कहने की कोशिश की।

“नहीं!”

मेरा खून फिर से खौल उठा। “अच्छा… कैसे नहीं करने देगी? माँ की लौड़ी… तुझे करना ही पड़ेगा।”

इतना कहकर मैंने उसके बाल पकड़ कर उसे घोड़ी बना दिया – चारों पैरों पर, उसकी गांड मेरी तरफ, उसका सिर नीचे, चेहरा तकिये में दबा हुआ। फिर मैंने उसके बाल खींच कर उसके सिर को ऊपर उठाया और उसके चूतड़ों पर स्केल से बेरहमी से मारना शुरू कर दिया – जोर से, बिना रुके, बाएँ-दाएँ, बाएँ-दाएँ। हर वार के साथ मैं चिल्लाता – “ले… माँ की लौड़ी… आज तो तेरी गांड फाड़ कर ही रहूँगा… बहुत तड़पाया है तूने मुझे… बहुत!”

हर स्केल की मार पर उसकी गांड उछलती और वो चीखती – “आह्ह्ह… सॉरी… सॉरी… माफ कर दो… अब और नहीं… गांड फट जाएगी…” लेकिन मैं नहीं रुका। मैंने लगभग 20-25 वार किए – उसके चूतड़ लाल से बैंगनी हो गए थे। स्केल के निशान उभर आए थे, कुछ जगह से हल्का खून भी आ गया था।

तब मैंने स्केल रखा और अपना लंड तैयार किया। मैंने अपने लंड पर उसकी चूत का पानी लगाया – उसकी चूत अब भी टपक रही थी – और फिर उसके गांड के छेद पर लंड रखा। उसकी गांड बहुत टाइट थी – एक छोटा सा गुलाबी छेद, जिसके चारों तरफ की त्वचा सिकुड़ी हुई थी। मैंने धीरे से दबाया – लंड फिसल गया। मैंने फिर दबाया – इस बार जोर से। आधा लंड अंदर गया और दीप की ऐसी चीख निकली जैसे उसे जान से मार दिया जा रहा हो – “आह्ह्हह्ह्ह्ह्ह… नहीं… नहीं… मत करो… फट गई… मेरी गांड फट गई…”

लेकिन मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी। मैंने अपने कूल्हों को आगे धकेला – धीरे-धीरे, जोर लगाकर – और एक ही झटके में अपना पूरा सात इंच का मोटा लंड उसकी टाइट गांड में डाल दिया। उसकी गांड ने मेरे लंड को ऐसे पकड़ा जैसे उस पर कोई कसावट डाल दी हो – इतना टाइट कि मेरे लंड में दर्द हो रहा था, लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था।

भाग 10: गांड की बेरहम चुदाई – स्केल, बेल्ट और चीखें

दीप दर्द से छटपटाने लगी। उसके हाथ-पैर फड़फड़ा रहे थे, वो मेरी पकड़ से छूटने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उसके बाल और कसकर पकड़ लिए थे। “प्लीज छोड़ो मुझे… बहुत ज्यादा दर्द हो रहा है… तुम तो मेरी गांड ही फाड़ डोगे…” वो रो रही थी – सिसकियाँ ले रही थी, उसके आँसू बिस्तर पर टपक रहे थे।

लेकिन इतनी चीख से मुझे कहाँ सुकून मिलने वाला था। उसका दर्द मेरे जोश को और बढ़ा रहा था। मैं उसकी गांड में धक्के मारने लगा – पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर बेरहम। हर धक्के के साथ मेरा लंड उसकी गांड की दीवारों को रगड़ता, उसकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लंड को दबोचती। उसके मुँह से सिर्फ ‘आह्ह्ह… उफ्फ… माआ… मर गई… मर गई…’ की आवाजें आ रही थीं।

कुछ धक्कों के बाद वो दर्द सह नहीं पाई और बिस्तर पर गिर गई। उसका पूरा शरीर ढीला पड़ गया था – वो गिर गई, अपने हाथ-पैर फैला दिए। लेकिन मैंने उसे फिर से घोड़ी बनाया – उसके बाल खींच कर ऊपर उठाया, उसके चूतड़ों को थप्पड़ मार कर सहलाया, और फिर से लंड उसकी गांड में डाल दिया।

इस बार मैंने बेल्ट भी निकाल ली। एक हाथ से उसके बाल पकड़े हुए थे, दूसरे हाथ में बेल्ट थी। हर 3-4 झटकों के बाद मैं बेल्ट से उसके चूतड़ों पर मारता। स्केल का दर्द अलग था, बेल्ट का दर्द अलग – बेल्ट से चमड़े की ‘चटाक्’ की आवाज़ आती थी और उसके चूतड़ों पर गहरी लकीरें पड़ जाती थीं। बेल्ट से मारने पर उसकी चीख और बढ़ जाती – “आह्ह्ह्ह… नहीं… और नहीं…” – तो मेरा जोश और बढ़ जाता।

मैं लगातार धक्के मार रहा था – कितने? मुझे पता नहीं। 50? 100? 200? मैं गिनती भूल गया था। मैं सिर्फ उसकी गांड चोद रहा था – बेरहमी से, पागलों की तरह। मेरे लंड पर उसकी गांड का खून और मेरा प्री-कम मिला हुआ था। उसके चूतड़ लाल, सूजे हुए, नीले पड़ चुके थे। उसकी गांड का छेद अब पूरी तरह खुल चुका था – वो अब टाइट नहीं था, वो मेरे लंड के आकार का हो गया था।

भाग 11: अंतिम राउंड – गांड में वीर्य और बाद का सुकून

काफी देर बाद – शायद आधे घंटे या उससे ज्यादा – जब मैं झड़ने को आया, तो मैंने उसे सीधा लिटाया। उसकी दोनों टांगें मैंने अपने कंधों पर रख लीं और आखिरी बार उसकी गांड मारनी शुरू की – अब और तेज़, और जोर से, और गहरा। उसकी गांड का छेद पूरी तरह खुला था और अब दर्द और सुख का कोई फर्क नहीं रह गया था। वो बस ‘ऊह्ह्ह्ह्ह… आआईई… उफ्फ…’ की आवाजें निकाल रही थी – अब चीख नहीं, बस कराह, बस सिसकियाँ।

लगभग 50 धक्कों के बाद – मैंने उन्हें गिना इस बार – मेरा वीर्य फूटा। एक लंबा, गर्म, मोटा धार। मैंने अपनी पूरी गर्मी – दिनों की तड़प, महीनों की बेचैनी, सालों की इच्छा – उसकी गांड के अंदर छोड़ दी। वीर्य उसकी गांड में भर गया – इतना कि बाहर टपकने लगा। मैं हांफता हुआ, पसीने से तर-बतर, उसके ऊपर लेट गया। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था, मेरी साँसें रुक रही थीं।

और उसने क्या किया? वो तुरंत मुझसे लिपट गई। उसने अपनी टांगों से मेरी कमर को जकड़ लिया, अपनी बाँहों से मेरी गर्दन को पकड़ लिया, और मेरे कान में फुसफुसाया – “तुमने आज मेरी जान निकाल दी… मैं मर गई… और जी भी गई… यही तो मैं चाहती थी… इतने महीनों से बस यही इंतजार था…”

मैं दंग रह गया। “मतलब?” मैंने हाँफते हुए पूछा।

“मैं जानबूझ कर गांड नहीं मरवा रही थी,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में दर्द और प्यार दोनों थे, “क्योंकि तुम हमेशा प्यार से करते थे, धीरे से, सहलाते हुए… लेकिन मैं चाहती थी कि तुम मुझ पर रौब जमाओ, मुझे रुलाओ, मुझ पर अपना हक जताओ… मैं चाहती थी कि तुम मेरी बेरहमी से गांड मारो… और तुमने कर दिखाया।”

हम कुछ देर ऐसे ही लिपटे रहे। फिर मैं सूसू करने बाथरूम गया – मुश्किल से चल पा रहा था, मेरी टांगें काँप रही थीं। जब वापस आया तो देखा – दीप वैसे ही नंगी पड़ी थी, बिस्तर पर, थकी हुई, हारी हुई, लेकिन संतुष्ट। उसका चेहरा लाल था – उंगलियों के निशान थे, गाल सूजे हुए थे। उसकी आँखें सूजी हुई थीं – रोने से। उसकी चूचियों पर काटने के निशान थे – गहरे, लाल। और उसकी गांड… उसकी गांड सूज गई थी, लाल पड़ गई थी, उसके चूतड़ों पर स्केल और बेल्ट के निशान थे – काली-नीली लकीरें।

पर उसके चेहरे पर वो सुकून था – जैसे सालों की तड़प एक रात में खत्म हो गई हो। जैसे वो आखिरकार वहाँ पहुँच गई हो जहाँ वो जाना चाहती थी।

मैं उसके पास गया, उसके आँसू पोंछे, उसके सूजे हुए गालों को चूमा, उसके चूतड़ों पर – जहाँ मैंने मारा था – 15-15 बार किस किया। उसके जले हुए चूतड़ों पर मेरे होंठ ठंडक की तरह लग रहे थे। फिर हम नंगे ही चिपक कर सो गए – उसकी गांड मेरी कमर से लगी हुई, मेरा लंड उसके चूतड़ों की दरार में।

भाग 12: अगले चार दिन – गांड फाड़ कर रख दी

उस रात के बाद मेरे और दीप के बीच सब कुछ बदल गया। वो अब गांड मारने से नहीं हिचकती थी – वो खुद माँगती थी। अगले दिन सुबह जब मैं उठा, तो दीप पहले से ही जाग रही थी। वो मेरे लंड को हाथ से सहला रही थी और मुस्कुरा रही थी। “आज फिर मारोगे?” उसने पूछा। मैंने बिना कुछ कहे उसे पलटा और फिर से उसकी गांड में लंड डाल दिया – इस बार प्यार से नहीं, बल्कि उसी बेरहमी से। वो चीखी नहीं – वो कराही।

मैंने लगातार 4 दिन दीप की गांड मारी। हर दिन, हर रात – सुबह, दोपहर, शाम – जब भी मौका मिला। मैंने उसकी गांड को ऐसे चोदा कि वो फट गई – सच में, उसकी गांड के छेद के आसपास की त्वचा फट गई थी, हल्का खून आया था, लेकिन वो रोई नहीं – वो हँसी। वो बोली – “अब ये निशान हमेशा रहेंगे… ये तुम्हारी मोहर है मेरी गांड पर।”

चौथे दिन के बाद दीप मुश्किल से चल पाती थी। वो तीन दिन तक करवट लेकर सोती रही – उसकी गांड इतनी सूज गई थी कि पीठ के बल लेटना मुश्किल था। पर वो शिकायत नहीं कर रही थी – वो गर्व से कह रही थी, “देखो मेरे पति ने मुझे कैसा बनाया है।”

भाग 13: निष्कर्ष – अब मुझे पता चल गया

उस रात के बाद मैं समझ गया – सच में समझ गया। मेरी पत्नी कोई समस्या नहीं थी, मेरी पत्नी कोई ठंडी नहीं पड़ गई थी। वो बस कुछ और चाहती थी – कुछ ऐसा जो वो मुझे बता नहीं सकती थी, क्योंकि वो खुद नहीं जानती थी कि उसे क्या चाहिए। पर जब मैंने उसे वो दिया – जब मैंने उसकी बेरहमी से गांड मारी, जब मैंने उसे रुलाया, जब मैंने उसके चूतड़ पीटे, जब मैंने उसके मुँह में लंड डाला – तब वो खिल उठी। तब उसने मुझसे कहा – “यही तो मैं चाहती थी।”

तो दोस्तों, अगर आपकी पत्नी भी कुछ ऐसा ही कर रही है – अगर वो गांड मरवाने से मना कर रही है, अगर वो आपको तड़पा रही है – तो हो सकता है कि वो भी यही चाहती हो। हो सकता है कि वो भी चाहती हो कि आप उस पर रोब जमाएँ, उसे काबू में करें, उसे रुलाएँ, उसकी बेरहमी से गांड मारें। क्योंकि कभी-कभी – कई बार – पत्नी को सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि उससे भी ज्यादा ज़रूरत होती है एक असली मर्द की – जो उसे वो दे जो वो खुद माँग नहीं सकती।

मेरी पत्नी यही तो चाहती थी – और मैंने उसे दे दिया।

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