डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – वियाग्रा, रात भर गांड चुदाई और दर्द से चीखती पत्नी

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डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक भारतीय पति वियाग्रा खाकर अपनी पत्नी की गांड को पूरी रात बेरहमी से चोदता है, और पत्नी दर्द से चीखती-रोती रहती है, तो वो रात कैसी होती है? यह हिंदी सेक्स कहानी डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 की है जहाँ आरव अपनी पत्नी आरुषि की गांड को पहले चाटता है, फिर वियाग्रा लेकर पूरी रात उसकी गांड मारता है – डिल्डो से डबल पेनिट्रेशन, पाँच-छह राउंड की बेरहम गांड चुदाई, और सुबह तक ऐसी हालत कि पत्नी चल भी नहीं पाती। दिल्ली के लाजपत नगर के अपार्टमेंट में सेट यह कहानी आपको दिखाएगी कि जब डैडी पर वियाग्रा का असर हो और उनका लिंड लोहे की रॉड की तरह खड़ा हो, तो वो अपनी गुड़िया की गांड का क्या हाल करते हैं। दर्द, चीखें, आँसू, भीख माँगना, और फिर बेहोशी – अगर आपको बेरहम एनल चुदाई, डबल पेनिट्रेशन, और डार्क डोमिनेंस वाली हिंदी सेक्स कहानियाँ पसंद हैं, तो यह दास्ताँ सिर्फ आपके लिए है।

भाग 1: डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – शाम की शुरुआत और गांड चाटना

वो शुक्रवार की शाम थी। बाहर दिल्ली की सर्द हवा चल रही थी, और लाजपत नगर की सड़कों पर हल्की रौनक थी। हमारे अपार्टमेंट में, मैं – आरुषि – रात के खाने की तैयारी कर रही थी। मैंने अपने डैडी – अपने पति आरव – के लिए उनकी फेवरेट डिश बनाई थी: बटर चिकन, गार्लिक नान, और जीरा राइस। पूरे घर में मक्खन और मसालों की खुशबू फैली हुई थी।

आरव शाम को ऑफिस से लौटे थे। वो थके हुए लग रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी – एक ऐसी चमक जो मैंने पहले भी देखी थी, जब वो कुछ खास प्लान कर रहे होते थे। उन्होंने अपना सूट उतारा, फ्रेश हुए, और फिर हम दोनों ने साथ में खाना खाया। खाने के दौरान वो सामान्य से ज़्यादा शांत थे – ज़्यादा बात नहीं कर रहे थे, बस मुझे देख रहे थे। उनकी नज़रें मेरे चेहरे पर, मेरे होंठों पर, मेरी गर्दन पर, और मेरे स्तनों पर घूम रही थीं। मैं समझ गई कि आज रात कुछ खास होने वाला है।

मैंने एक हल्की सी सफेद नाइटी पहनी हुई थी – पतली, पारदर्शी, जिसके नीचे मैंने कुछ नहीं पहना था। मेरे निप्पल नाइटी के कपड़े के नीचे साफ उभर रहे थे, और मेरी चूत और गांड पूरी तरह नंगी थीं। जैसा डैडी को पसंद था।

खाने के बाद, मैंने बर्तन साफ किए और किचन ठीक किया। जब मैं वापस लिविंग रूम में आई, तो आरव सोफे पर बैठे थे – लेकिन अब उनके हाथ में कुछ था। एक छोटी सी गोली। नीली रंग की। वियाग्रा।

मेरी साँसें तेज़ हो गईं। मैंने पहले कभी उन्हें वियाग्रा लेते नहीं देखा था। मैं जानती थी कि इसका मतलब क्या है – आज रात वो रुकने वाले नहीं थे।

“डैडी…” मैंने धीरे से कहा।

“चुप।” उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक अटल अधिकार था। “आज रात, तुम मेरी हो – पूरी तरह। और आज रात, मैं तुम्हारी गांड मारूँगा। पूरी रात।”

मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। मेरी गांड की चुदाई हमने पहले भी की थी – कई बार। लेकिन ये… ये अलग था। वियाग्रा। पूरी रात। मैं डर गई, लेकिन साथ ही मेरी चूत अपने आप गीली होने लगी।

आरव ने गोली पानी के साथ निगल ली। फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा और अपनी उंगली से इशारा किया – पास आने का।

मैं धीरे-धीरे उनके पास गई। उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरी नाइटी को ऊपर से पकड़कर सिर के ऊपर से उतार दिया। अब मैं पूरी तरह नंगी थी। मेरे स्तन – गोरे, बड़े, मुलायम – हवा में लटक रहे थे, मेरे निप्पल सख्त हो चुके थे। मेरी चूत – शेव की हुई, गुलाबी, गीली – और मेरी गांड – गोल, मोटी, चिकनी – पूरी तरह खुली हुई थीं।

“घूमो,” उन्होंने हुक्म दिया।

मैंने उनकी बात मानी और अपनी पीठ उनकी तरफ कर दी।

“झुको।”

मैं झुक गई – अपने हाथ सोफे की पीठ पर रखकर, अपनी गांड हवा में उठाकर। मेरी चूत और गांड का छेद दोनों उनके सामने थे।

आरव ने मेरे कूल्हों को पकड़ा और अपना चेहरा मेरी गांड के पास ले आए। मैंने महसूस किया कि उनकी साँसें मेरी गांड के छेद पर पड़ रही थीं – गर्म, धीमी, मादक। और फिर – उनकी जीभ।

“आह्ह्ह, डैडी!” मैं चीख पड़ी।

उन्होंने अपनी जीभ मेरी गांड के छेद पर रख दी और उसे गोल-गोल घुमाने लगे। उनकी जीभ गर्म, गीली और मुलायम थी – और वो मेरी गांड के हर कोने, हर सिलवट को चाट रहे थे। मैंने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया था। मेरी चूत से रस टपकने लगा, मेरी जाँघों पर बहने लगा।

आरव ने मेरे चूतड़ों को दोनों हाथों से फैलाया और अपनी जीभ को मेरी गांड के अंदर धकेल दिया। उनकी जीभ मेरे छेद के अंदर जा रही थी – अंदर-बाहर, अंदर-बाहर – जैसे वो मुझे चोद रहे हों। मैं कराह रही थी, मेरी टाँगें काँप रही थीं, और मेरी चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी।

“डैडी… प्लीज़… बहुत अच्छा लग रहा है…” मैंने हाँफते हुए कहा।

लेकिन आरव ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस मेरी गांड चाटते रहे – लगभग दस मिनट तक। उनकी लार मेरी गांड के छेद पर, मेरे चूतड़ों पर, मेरी चूत पर बह रही थी। मेरी गांड का छेद अब पूरी तरह गीला और ढीला हो चुका था – तैयार।

तभी उन्होंने अपना चेहरा हटाया। मैंने पीछे मुड़कर देखा – उनकी ठुड्डी और होंठ मेरी लार और मेरे रस से भीगे हुए थे। उनकी आँखों में एक जंगली चमक थी।

“बेडरूम में चलो,” उन्होंने कहा। “अब असली खेल शुरू होगा।”

भाग 2: डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – वियाग्रा का असर और डिल्डो से डबल पेनिट्रेशन

हम बेडरूम में पहुँचे। मैंने देखा कि आरव ने पहले से ही सब कुछ तैयार कर रखा था। बिस्तर पर लाल रेशमी चादर बिछी हुई थी। पास की मेज़ पर एक बड़ा सा डिल्डो रखा था – कम से कम 8 इंच लंबा, मोटा, नसों के डिज़ाइन वाला। साथ में ल्यूब की एक बोतल, मेरा प्रिंसेस प्लग, और हमारा काला चमड़े का पैडल।

मेरी साँसें तेज़ हो गईं। मैं समझ गई कि आज रात क्या होने वाला है।

“बिस्तर पर आओ। हाथों और घुटनों पर।” आरव की आवाज़ अब पूरी तरह बदल चुकी थी – वो ‘डैडी’ नहीं थे, वो ‘भालू’ थे। उनका जानवर।

मैंने वैसा ही किया। बिस्तर पर चढ़कर, अपने हाथों और घुटनों पर आ गई – मेरी गांड हवा में, मेरी चूत नीचे, मेरा चेहरा तकिए में। मैंने पीछे मुड़कर देखा। आरव ने अपनी लुंगी उतार दी थी। उनका लंड– 7 इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ – पहले से ही पूरी तरह खड़ा था। लेकिन मुझे पता था कि वियाग्रा का असर अभी शुरू भी नहीं हुआ था। जब होगा, तो ये और भी बड़ा और सख्त हो जाएगा।

उन्होंने ल्यूब की बोतल उठाई और अपने लिंड पर ढेर सारा ल्यूब लगाया। फिर उन्होंने मेरी गांड के छेद पर भी ल्यूब लगाया – ठंडा, चिपचिपा जेल मेरी गर्म त्वचा पर। उनकी उंगलियाँ मेरे छेद पर गोल-गोल घूम रही थीं, उसे फैला रही थीं, तैयार कर रही थीं।

और फिर – बिना किसी चेतावनी के – उन्होंने अपना लंड मेरी गांड में डाल दिया।

“आह्ह्ह्ह! डैडी!” मैं ज़ोर से चीख पड़ी। दर्द की एक तीखी लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। मेरी गांड का छेद – भले ही चाटने और ल्यूब से तैयार था – फिर भी इतना बड़ा लिंड लेने के लिए तैयार नहीं था। मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और अपने दाँत कस लिए।

लेकिन आरव नहीं रुके। वो धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगे – पहले धीमे, फिर तेज़, फिर और तेज़। हर धक्के के साथ उनका लंड मेरी गांड में और गहराई तक जा रहा था। मेरी चूत से रस टपक रहा था, लेकिन मेरी गांड में आग लग रही थी।

“चुप रहो, गुड़िया,” आरव ने गुर्राकर कहा। “अभी तो शुरुआत है।”

करीब दस मिनट तक वो मेरी गांड चोदते रहे। मेरा दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा था – या शायद मुझे इसकी आदत पड़ने लगी थी। लेकिन तभी – उन्होंने अपना लंड बाहर निकाला।

मैंने राहत की साँस ली। लेकिन वो राहत सिर्फ कुछ सेकंड की थी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा तो आरव ने डिल्डो उठा लिया था। उन्होंने उस पर ल्यूब लगाया, और फिर वो मेरे पास आए।

“आज रात, तुम्हारे दोनों छेद भरे रहेंगे,” उन्होंने कहा।

और फिर – उन्होंने डिल्डो को मेरी चूत में धकेल दिया।

“ओह्ह्ह, डैडी!” मैं कराह उठी। मेरी चूत गीली थी, इसलिए डिल्डो आसानी से अंदर चला गया – 8 इंच लंबा, मोटा, मेरी चूत को पूरी तरह भरता हुआ।

लेकिन आरव अभी खत्म नहीं हुए थे। उन्होंने तुरंत अपना लिंड – जो अब वियाग्रा की वजह से पहले से भी ज़्यादा सख्त और बड़ा लग रहा था – मेरी गांड में वापस डाल दिया।

अब मेरे दोनों छेद भरे हुए थे। मेरी चूत में डिल्डो, और मेरी गांड में आरव का लंड। डबल पेनिट्रेशन। मैं इतनी भरी हुई थी कि मुझे लग रहा था कि मैं फट जाऊँगी। हर धक्के के साथ – और आरव अब ज़ोर-ज़ोर से धक्के मार रहे थे – डिल्डो मेरी चूत में और अंदर जा रहा था, और उनका लिंड मेरी गांड में और गहराई तक घुस रहा था।

“डैडी… प्लीज़… बहुत ज़्यादा हो रहा है…” मैंने गिड़गिड़ाकर कहा।

“चुप। तुम मेरी हो। तुम्हारे छेद मेरे हैं। मैं जो चाहूँ करूँ।” आरव की आवाज़ में कोई दया नहीं थी।

वियाग्रा का असर अब पूरी तरह हो चुका था। उनका लंड लोहे की रॉड की तरह था – न तो ढीला पड़ रहा था, न ही थक रहा था। वो मेरी गांड को बेरहमी से चोद रहे थे – हर धक्का पिछले से ज़्यादा ज़ोरदार, हर धक्का पिछले से ज़्यादा गहरा। मेरी चीखें पूरे अपार्टमेंट में गूँज रही थीं।

भाग 3: डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – पूरी रात बेरहम गांड चुदाई, चीखें और आँसू

पहला राउंड खत्म हुआ तब, जब आरव ने मेरी गांड में अपना पहला माल छोड़ा। उनका गर्म, गाढ़ा वीर्य मेरी गांड में भर गया। मैंने राहत की साँस ली – मुझे लगा कि अब सब खत्म हो गया।

लेकिन मैं गलत थी।

आरव ने अपना लंड बाहर निकाला, लेकिन वो अब भी पूरी तरह खड़ा था – वियाग्रा का कमाल। उन्होंने मुझे पलटा, मेरी टाँगें उठाईं, और फिर से अपना लंड मेरी गांड में डाल दिया। इस बार वो और भी ज़ोर से धक्के मार रहे थे। मेरी गांड का छेद अब ढीला पड़ने लगा था – लेकिन फिर भी दर्द हो रहा था। बहुत ज़्यादा दर्द।

“डैडी, प्लीज़… मुझे छोड़ दो… मैं अब और नहीं सह सकती…” मैंने रोते हुए कहा। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, मेरी नाक बह रही थी, मेरा गला रुंध गया था।

“नहीं। तुम मेरी हो। तुम्हारी गांड मेरी है। मैं जब तक चाहूँ, तब तक चोदूँगा।” आरव ने गुर्राकर कहा और अपनी रफ्तार और तेज़ कर दी।

उन्होंने मेरी कमर पकड़ी और मुझे ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगे। हर धक्के के साथ मेरा शरीर बिस्तर पर आगे खिसकता जा रहा था। मैंने चादर को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि मेरी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए। मैं चीख रही थी – दर्द से, बेबसी से – लेकिन आरव रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

दूसरा राउंड खत्म हुआ। उन्होंने फिर से मेरी गांड में माल छोड़ा। मेरी गांड अब पूरी तरह भर चुकी थी – उनका वीर्य, ल्यूब, और मेरा अपना रस, सब मिलकर एक चिपचिपा मिश्रण बन गया था।

लेकिन उनका लंड अब भी खड़ा था।

तीसरा राउंड शुरू हुआ। इस बार उन्होंने मुझे उल्टा लिटाया – मेरी पीठ बिस्तर पर, मेरे पैर हवा में, उनके कंधों पर। उन्होंने फिर से अपना लंड मेरी गांड में डाला। इस पोज़िशन में, वो और भी गहराई तक जा रहे थे। मैंने अपने हाथों से उनकी छाती को धकेलने की कोशिश की, उन्हें रोकने की कोशिश की – लेकिन वो मुझसे बहुत ज़्यादा ताकतवर थे।

“डैडी… प्लीज़… मेरी गांड फट रही है… प्लीज़ रुक जाओ…” मैं गिड़गिड़ा रही थी, रो रही थी, भीख माँग रही थी।

लेकिन आरव पर कोई असर नहीं हुआ। वियाग्रा और अपनी डोमिनेंस की वजह से, वो एक अलग ही दुनिया में थे। उनकी आँखों में सिर्फ एक चीज़ थी – मेरी गांड। और वो उसे तब तक चोदना चाहते थे जब तक उनका दिल न भर जाए।

“तू मेरी है, कमीनी! तेरी गांड मेरी है! मैं तुझे जब चाहूँ, जैसे चाहूँ, चोदूँगा!” वो चिल्लाए और उन्होंने मेरी गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा – धप!

मैं चीख पड़ी। दर्द की एक और लहर। लेकिन उनका लिंड अब भी मेरी गांड में था – अंदर-बाहर, अंदर-बाहर, बिना रुके।

तीसरा राउंड खत्म हुआ। चौथा शुरू हुआ। इस बार उन्होंने मुझे करवट से लिटाया और पीछे से मेरी गांड में घुस गए। मेरी चूत अब पूरी तरह से खाली थी – डिल्डो बाहर निकल चुका था – लेकिन मेरी गांड में आग लगी हुई थी। हर धक्के के साथ मुझे लगता कि मेरी गांड फट जाएगी।

मैं अब और नहीं लड़ पा रही थी। मेरी सारी ताकत खत्म हो चुकी थी। मैं बस रो रही थी और चीख रही थी – बेबस, लाचार, पूरी तरह उनके रहम पर।

चौथा राउंड खत्म हुआ। पाँचवाँ शुरू हुआ। मैं अब अर्ध-बेहोशी की हालत में थी। मेरी आँखें सूज गई थीं, मेरा गला बैठ गया था, और मेरी गांड… मेरी गांड का छेद अब पूरी तरह खुल चुका था – लाल, सूजा हुआ, जलता हुआ। लेकिन आरव का लंड अब भी खड़ा था। वियाग्रा का असर अभी तक खत्म नहीं हुआ था।

“डैडी… प्लीज़… मुझे माफ कर दो… मैं अब और नहीं ले सकती…” मैंने फुसफुसाकर कहा। मेरी आवाज़ अब सिर्फ एक भर्राई हुई सिसकी थी।

आरव ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में अब भी वो जंगलीपन था, लेकिन शायद – शायद – थोड़ी सी चिंता भी। उन्होंने अपनी रफ्तार धीमी की, लेकिन रुके नहीं।

“बस एक आखिरी बार, गुड़िया। एक आखिरी बार।”

और उन्होंने छठा और आखिरी राउंड शुरू किया। इस बार वो थोड़े धीमे थे – शायद वियाग्रा का असर कम होने लगा था, या शायद वो खुद भी थक चुके थे। लेकिन फिर भी, उनका लंड अब भी सख्त था, और मेरी गांड अब भी जल रही थी।

मुझे नहीं पता कि वो राउंड कब खत्म हुआ। मुझे नहीं पता कि मैं कब सो गई। मुझे बस इतना याद है कि मैं रो रही थी, चीख रही थी, और फिर – सब कुछ अंधेरा हो गया।

भाग 4: डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – सुबह, दर्द और डैडी का पश्चाताप

सुबह हुई। खिड़की से धूप अंदर आ रही थी, और चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। मेरी आँखें खुलीं तो मैंने पाया कि मैं बिस्तर पर लेटी हुई थी – नंगी, बिखरी हुई, टूटी हुई और उनका लंड अभी तक मेरी गांड में ही था।। मेरे पूरे शरीर में दर्द हो रहा था। मेरी गांड… मेरी गांड में तो जैसे आग लगी हुई थी। मैंने हिलने की कोशिश की, और दर्द की एक तीखी लहर ने मुझे रोक दिया।

मैंने अपने आस-पास देखा। बिस्तर की चादर अस्त-व्यस्त थी – ल्यूब, वीर्य, और मेरे रस के दागों से भरी हुई। डिल्डो फर्श पर पड़ा था। पैडल पास की मेज़ पर। और आरव… आरव मेरी गांड में लंड डाले ही सो रहे थे – गहरी नींद में, थके हुए, लेकिन संतुष्ट। उसने मेरे सोने के बाद भी रात भर ना जाने कितनी बार मेरी गांड चोदा था।

मैंने जैसे तैसे उनका लंड अपनी गांड से निकाला और धीरे-धीरे करवट बदली और बिस्तर से उतरने की कोशिश की। जैसे ही मेरे पैर फर्श पर पड़े, मैं दर्द से चीख पड़ी। मेरी गांड का छेद इतना सूज गया था कि मैं चल भी नहीं पा रही थी। मैं लड़खड़ाकर वापस बिस्तर पर गिर पड़ी।

मेरी चीख सुनकर आरव की आँखें खुल गईं। उन्होंने मुझे देखा – दर्द से कराहती हुई, बिस्तर पर गिरी हुई – और उनकी आँखों में तुरंत चिंता आ गई। वो उठे और मेरे पास आए।

“गुड़िया… तुम ठीक हो?” उनकी आवाज़ में अब वो ‘भालू’ वाली गुर्राहट नहीं थी। अब सिर्फ प्यार था, चिंता थी, और… पश्चाताप।

“डैडी… मैं चल नहीं पा रही…” मैंने रोते हुए कहा।

आरव ने मुझे गोद में उठा लिया – बिल्कुल एक बच्ची की तरह – और बाथरूम में ले गए। उन्होंने गर्म पानी से टब भरा और मुझे धीरे-धीरे उसमें उतारा। गर्म पानी ने मेरी जलती हुई गांड को छुआ तो पहले तो दर्द हुआ, लेकिन फिर धीरे-धीरे राहत मिलने लगी।

उन्होंने अपने हाथों से मेरे शरीर को धोया धीरे-धीरे, बहुत प्यार से। उनकी उंगलियाँ मेरी गांड के आस-पास घूम रही थीं, लेकिन अब वो बेरहम नहीं थीं – वो कोमल थीं, देखभाल करने वाली थीं। उन्होंने मेरी गांड पर ठंडी क्रीम लगाई, मेरी पीठ पर मालिश की, और मेरे बालों को शैंपू से धोया। हर स्पर्श के साथ, वो मुझसे माफी माँग रहे थे – बिना शब्दों के।

जब मैं टब से बाहर निकली, तो मैंने आईने में अपना प्रतिबिंब देखा। मेरी आँखें सूजी हुई थीं, मेरे होंठ सूखे हुए थे, और मेरी गांड… मेरी गांड का छेद लाल, सूजा हुआ और खुला हुआ था। लेकिन उस सबके बावजूद, मेरे चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। मैं जानती थी कि कल रात जो हुआ, वो सिर्फ सेक्स नहीं था – वो समर्पण की पराकाष्ठा थी। मैंने अपने डैडी को अपनी हर सीमा पार करने दी थी, और मैं बच गई थी।

आरव ने मुझे एक मुलायम तौलिए में लपेटा और गोद में उठाकर वापस बेडरूम में ले आए। उन्होंने बिस्तर की गंदी चादर बदल दी थी – अब उस पर साफ, सफेद, खुशबूदार चादर बिछी हुई थी। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे पास लेट गए। उनकी बाहें मेरे चारों ओर लिपट गईं – गर्म, मज़बूत, सुरक्षित।

“गुड़िया,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। उनकी आवाज़ अब बिल्कुल अलग थी – नर्म, भावुक, प्यार से भरी। “मुझे माफ कर दो। मैं… मैं बहुत ज़्यादा हो गया था। वियाग्रा की वजह से… और अपनी वजह से भी। मैंने तुम्हारी सीमाएँ पार कर दीं।”

मैंने अपना सिर उनकी छाती पर रख दिया और उनकी धड़कनें सुनीं। “डैडी… आपको माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है। मैंने सेफ-वर्ड इस्तेमाल नहीं किया। मैं रोई, मैंने भीख माँगी, लेकिन मैंने ‘संतरा’ नहीं कहा। क्योंकि… क्योंकि कहीं न कहीं, मुझे भी ये चाहिए था। मुझे भी अपनी सीमाएँ पार करनी थीं।”

आरव ने मेरी ठुड्डी उठाई और मेरी आँखों में देखा। “तुम मेरी सबसे बहादुर लड़की हो। लेकिन अगली बार, अगर बहुत ज़्यादा हो, तो सेफ-वर्ड इस्तेमाल करना। समझी?”

“जी, डैडी।”

उन्होंने मेरे माथे पर एक लंबा, प्यार भरा चुंबन दिया। फिर वो उठे और किचन में गए। कुछ देर बाद वो एक ट्रे लेकर आए – उसमें दो कप अदरक वाली चाय, बटर टोस्ट, और मेरे लिए एक गर्म पानी की बोतल थी। उन्होंने वो बोतल मेरी पीठ के पीछे रख दी, और मेरे हाथ में चाय का कप थमा दिया।

हमने साथ में चाय पी – मैं बिस्तर पर टिकी हुई, वो मेरे पास बैठे हुए। बाहर दिल्ली की सर्द सुबह थी, लेकिन हमारे बेडरूम में सब कुछ गर्म और सुरक्षित था।

“डैडी,” मैंने चाय का एक घूँट लेते हुए कहा।

“हाँ, गुड़िया?”

“कल रात… क्या आपको मज़ा आया?”

आरव ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराए – वही प्यारी सी मुस्कान, जो मेरा सारा दर्द भुला देती थी। “हाँ, गुड़िया। बहुत मज़ा आया। लेकिन उससे भी ज़्यादा मज़ा अभी आ रहा है – तुम्हें ऐसे अपनी बाहों में लेकर, तुम्हारी देखभाल करते हुए।”

मैं मुस्कुराई और उनकी छाती से सट गई। “मुझे भी, डैडी। मुझे भी।”

“लेकिन अगली बार,” उन्होंने शरारत से कहा, “वियाग्रा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मेरी गुड़िया ही काफी है मेरे लंड को खड़ा रखने के लिए।”

मैं हँस पड़ी – दर्द के बावजूद, थकान के बावजूद। “डैडी!”

“क्या? सच कह रहा हूँ।” वो भी हँस पड़े।

हम दोनों वहीं बिस्तर पर लेटे रहे – मैं उनकी बाहों में, वो मेरे बालों को सहलाते हुए। पूरा दिन हमने ऐसे ही बिताया – आराम करते हुए, एक-दूसरे की बाहों में, बिना किसी जल्दी के। आरव ने मेरे लिए खाना बनाया, मुझे खिलाया, मेरी गांड पर क्रीम लगाई, और मुझे बार-बार बताया कि वो मुझसे कितना प्यार करते हैं।

ये था डैडी पति के लिए एक अच्छी पत्नी भाग 4 – वो अध्याय जहाँ डैडी ने वियाग्रा खाकर अपनी गुड़िया की गांड को पूरी रात बेरहमी से चोदा, जहाँ गुड़िया ने दर्द से चीख-चीखकर भी सेफ-वर्ड नहीं बोला, और जहाँ सुबह ने दोनों को एक-दूसरे की बाहों में और भी करीब ला दिया। क्योंकि कभी-कभी, एक अच्छी पत्नी बनने के लिए – सिर्फ कोमलता नहीं, बल्कि बेरहमी भी सहनी पड़ती है। और कभी-कभी, एक अच्छा डैडी बनने के लिए – सिर्फ सज़ा देना नहीं, बल्कि माफी माँगना भी आना चाहिए।

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