बचपन के प्यार से सुहागरात में चुदाई -रोमांटिक सेक्स कहानी

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बचपन के प्यार से सुहागरात में चुदाई – क्या बचपन के प्यार की वो मीठी यादें कभी जवानी के जिस्मानी जुनून में बदल सकती हैं? यह रोमांटिक हिंदी सेक्स स्टोरी पटना की उन गलियों की है, जहाँ प्यार मोहल्ले की चाय की चुस्कियों की तरह धीरे-धीरे दिल में उतरता है। यह कहानी है राज और उसकी बचपन की सहेली सुधा की, जो एक अनजाने किस के बाद एक दूसरे के लिए पागल हो गए। लॉकडाउन के सन्नाटे में उनका प्यार पनपा और फिर शादी की पहली रात वह तूफान बनकर टूटा। उस रात सुधा ने पहली बार राज के लंड को अपनी चूत में लिया, दर्द से चीखी, खून देखा, और फिर पूरी रात जोरदार चुदाई का मज़ा लिया। यह कहानी है बचपन के प्यार से सुहागरात में चुदाई की – एक इमोशनल और हॉट सेक्स की पूरी दास्तान।

भाग 1: बचपन की वो गलियाँ और लॉकडाउन का सन्नाटा

मेरा नाम राज है और मैं वाराणसी के एक शांत मोहल्ले में रहता हूँ। वाराणसी की वो गलियाँ, जहाँ हर सुबह मंदिर की घंटियाँ बजती थीं और शाम को मोहल्ले के बच्चे गलियों में क्रिकेट खेलते थे। हमारे घर के ठीक बगल में ही अंकल और आंटी का परिवार रहता था। अंकल सरकारी दफ्तर में बड़े ओहदे पर थे और आंटी एक साधारण सी हाउस वाइफ थीं, लेकिन उनके घर की रौनक थी सुधा। सुधा उनकी इकलौती बेटी थी, और बचपन से ही थोड़ी अलग किस्म की लड़की थी। जहाँ मोहल्ले की दूसरी लड़कियाँ गुड़िया-गुड्डे के खेल खेलती थीं, वहीं सुधा अक्सर मेरे साथ किताबें पढ़ने या शतरंज खेलने बैठ जाती थी। वह कम बोलती थी, लेकिन जब बोलती थी तो उसकी बातों में एक गहराई और समझदारी होती थी जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा थी।

मुझे अच्छी तरह याद है कि कैसे मेरी माँ और उसकी मम्मी अक्सर मज़ाक में कह दिया करती थीं, “देखो, कितनी अच्छी जोड़ी लगती है। तुम दोनों बड़े होकर शादी कर लेना।” उस ज़माने में यह बात सुनकर हम दोनों के चेहरे शर्म से लाल हो जाते थे। हम एक दूसरे की तरफ देखने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे। सुधा तो झट से वहाँ से भाग जाती थी और मैं अपनी माँ से बहस करने लगता कि वह ऐसा क्यों कहती हैं। लेकिन शायद सुधा के मन में उस समय भी मेरे लिए एक अलग सी जगह थी, एक ऐसा एहसास जिसे उसने अपने नन्हें से दिल में सहेज कर रखा हुआ था। वह हमेशा मेरे लिए एक खास लड़की रही, भले ही मैं उस समय यह नहीं समझ पाया था।

फिर समय का पहिया तेजी से घूमा। पढ़ाई के सिलसिले में मैं इंजीनियरिंग करने बाहर दूसरे शहर चला गया। हॉस्टल की ज़िंदगी, नए दोस्त, कैंटीन की बेस्वाद चाय और परीक्षा की टेंशन में बचपन की वो गलियाँ और मोहल्ले की बातें धुंधली पड़ने लगीं। सुधा भी अपनी आगे की पढ़ाई के लिए किसी और शहर चली गई थी। हमारा संपर्क लगभग खत्म हो गया था। सालों बीत गए, और हमारी ज़िंदगी की पटरियाँ अलग-अलग दिशाओं में दौड़ने लगीं। इस बीच मेरी एक गर्लफ्रेंड भी बनी, लेकिन वह रिश्ता कुछ खास नहीं चल पाया और आखिरकार उसने मुझसे ब्रेकअप कर लिया। मैं अंदर से बुरी तरह टूट गया था। उसके बाद मैंने फैसला किया कि शादी मैं घर वालों की मर्जी से ही करूँगा।

यह बात साल 2020 के उस दौर की है, जब पूरी दुनिया लॉकडाउन की चपेट में थी। मैं अपने घर पटना में फंस गया था। चारों तरफ सन्नाटा था, न कहीं आने-जाने की इजाज़त थी, न ही दोस्तों से मिलने का कोई रास्ता। उसी दौरान सुधा भी अपने घर वापस आ गई थी। वर्क फ्रॉम होम के चलते उसे भी यहीं रहना पड़ रहा था। शुरू-शुरू में तो हम बस औपचारिक रूप से मिलते, हाल-चाल पूछते और अपनी-अपनी ज़िंदगी में मसरूफ हो जाते। लेकिन धीरे-धीरे हमारे बीच वही पुरानी सहजता और अपनापन वापस लौटने लगा जो बचपन में था। वह अक्सर मेरे घर आती और हम छत पर बैठकर घंटों पुरानी यादें ताज़ा किया करते। उसकी हँसी, उसके बालों की खुशबू, और उसकी आँखों की वह चमक – सब कुछ धीरे-धीरे मेरे दिल में फिर से जगह बना रहा था।

हमारे घरवालों के लिए यह बहुत सामान्य बात थी। उनके दिमाग में कभी यह ख्याल ही नहीं आया कि हम अब बच्चे नहीं रहे, बल्कि जवान हो चुके हैं और हमारे बीच कोई दूसरा रिश्ता भी पनप सकता है। वे हमें आज भी वही दस-बारह साल के बच्चे समझते थे। उनकी इसी बेफिक्री की वजह से हमें एक दूसरे के करीब आने का भरपूर मौका मिला, बिना किसी रोक-टोक के। एक दिन की सुबह, जब पूरा घर शांत था, मैं अपने कमरे में गहरी नींद में सोया हुआ था। सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी और कमरे में एक सुनहरी रोशनी फैली हुई थी। मेरी माँ सुधा के घर कोई काम से गई होंगी या फिर उसने खुद ही आने का सोचा होगा। माँ ने उसे कहा, “बेटा, जाओ राज को जगा दो। दोनों चाय पी लेना, मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ।”

सुधा हाथों में चाय की ट्रे लिए मेरे कमरे में दाखिल हुई। उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी हुई थी, लेकिन उसमें भी वह बहुत सुंदर लग रही थी। उस वक्त न जाने वह क्या सोच रही थी। उसने ट्रे मेज पर रखी और धीरे से मेरा कंधा हिलाने लगी। “राज… राज… चाय पी लो।” उसकी आवाज़ बहुत नर्म और मीठी थी, जैसे बचपन में होती थी। लेकिन मैं बुरी तरह नींद के आगोश में डूबा हुआ था। मैंने उस रात देर तक काम किया था और मेरी आँखें बहुत भारी थीं। दो-तीन बार आवाज़ देने और हिलाने के बाद भी जब मैं नहीं जगा, तो उसने शायद थोड़ी ज़ोर से मेरा हाथ खींचा।

और फिर वह हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। नींद में ही मैंने उसे अपनी तरफ ज़ोर से खींच लिया और अपनी बाहों के घेरे में कस कर भर लिया। मेरे दिमाग में मेरी एक्स-गर्लफ्रेंड का चेहरा घूम रहा था – वही चेहरा जिसने मुझे दर्द दिया था, जिसने मुझे धोखा दिया था। नींद की बेहोशी में मैं सुधा को वही समझ बैठा। उसके चेहरे को पकड़ कर मैंने सीधे उसके नर्म और गुलाबी होंठों पर एक गहरा किस कर दिया। मेरे होंठ उसके होंठों से चिपक गए, और उस पल मुझे लगा जैसे मैं सपना देख रहा हूँ।

वह पल बहुत छोटा था, लेकिन उसका असर बिजली के झटके जैसा था। सुधा पूरी तरह स्तब्ध और सहमी हुई थी। उसके हाथों में चाय की ट्रे थर्रा रही थी। अचानक मेरी आँख खुली। मुझे लगा कि मैं अभी भी सपना देख रहा हूँ, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरे सीने से चिपकी हुई सुधा काँप रही है और उसकी साँसें तेज चल रही हैं, तो मेरी नींद उसी वक्त गायब हो गई। मैं फौरन उठ कर बैठ गया और बौखलाहट में बोला, “हे भगवान! सुधा… मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। माफ कर दो यार, मैं सोच रहा था कि तुम कोई और हो। मैंने गलती से तुम्हें अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड समझ लिया। मुझे माफ कर दो, प्लीज।”

मेरी बात सुनकर सुधा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी आँखों में न जाने क्या भाव थे, शर्म, गुस्सा या कुछ और जो मैं उस वक्त समझ नहीं पाया। उसने एक शब्द भी नहीं कहा। बिना कुछ बोले वह उठी, अपने कपड़े ठीक किए और तेज कदमों से कमरे से बाहर चली गई। उसके जाने के बाद कमरा एकदम सन्नाटे में डूब गया। चाय मेज पर ठंडी होती रही और मैं अपने आप को कोसता रहा। उस दिन के बाद सुधा पूरे तीन दिनों तक हमारे घर नहीं आई। मुझे लगा कि मैंने उसकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया है और वह मुझसे हमेशा के लिए नाराज हो गई है। मैं अंदर ही अंदर बहुत परेशान था, क्योंकि मैं उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था।

चौथे दिन शाम को वह अचानक मेरे घर आई। उसने एक नीली रंग की सलवार-कमीज पहनी हुई थी और उसके बाल खुले हुए थे। उसके चेहरे पर नाराजगी नहीं बल्कि एक अजीब सी शरारत और सकून था। मैंने फौरन उससे फिर से माफी मांगी, “सुधा, प्लीज यकीन करो, उस दिन मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी। मैं सॉरी हूँ।” उसने मेरी तरफ देखा और एक हल्की सी मुस्कान के साथ बात को टाल दिया, “अरे छोड़ो न, हो जाता है।” उसकी इस बात से मेरी जान में जान आई और धीरे-धीरे हमारी बातचीत फिर से पहले जैसी होने लगी। अब हम और भी ज्यादा खुलकर बातें करने लगे।

एक दिन शाम को हम छत पर बैठे हुए आसमान में उगते तारों को देख रहे थे। शाम की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में लाखों तारे चमक रहे थे। तभी अचानक सुधा ने बड़े ही रहस्यमयी अंदाज में पूछा, “राज, मुझे एक बात बताओ। उस दिन तुम सच में किसके बारे में सोच रहे थे?” मैंने अनजान बनने की कोशिश करते हुए कहा, “किस दिन?” वह हल्के से मुस्कुराई और बोली, “तुम जानते हो, जिस दिन तुमने मुझे किस किया था। मैं अच्छी तरह समझ गई थी कि तुमने ‘सॉरी’ क्यों कहा था।” मैंने चौंक कर पूछा, “तुम मेरी बातों पर इतना गौर करती हो?” उसने अपनी आँखें मेरी आँखों में गड़ाते हुए कहा, “अब इतना तो हक बनता है मेरा।”

उसके इस जवाब ने मेरे दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। उसकी आँखों में मैंने प्यार देखा, एक बेपनाह प्यार। मैंने उसे अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड और ब्रेकअप के बारे में सब कुछ बता दिया – कैसे उसने मुझे धोखा दिया, कैसे मैं टूट गया, और कैसे मैंने उसे भूलने की कोशिश की। मेरी बात खत्म होने के बाद सुधा ने बड़े ही अजीब तरीके से मेरी आँखों में देखते हुए कहा, “पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि तुम्हें कोई कैसे खो सकता है। क्या तुम्हें भी कोई खोना चाहेगी क्या?” उसका यह वाक्य किसी पहेली से कम नहीं था। मैं उसकी बात का मतलब नहीं समझ पाया, लेकिन उसकी आँखों में जो प्यार और अपनापन मैंने देखा, उसने मुझे पूरी तरह बदल कर रख दिया। फिर वह बिना कुछ और कहे वहाँ से चली गई, लेकिन उसके जाने के बाद उसकी बात मेरे दिमाग में गूंजती रही।

भाग 2: रंगों में घुलता प्यार और पहला इज़हार

फिर दीवाली का त्यौहार आया। पूरे मोहल्ले में रंग-रोगन और सजावट का काम चल रहा था। हर घर में सफेदी और रंग-रोगन हो रहा था, और गलियाँ सजने लगी थीं। हम सब मिलकर घर की पुताई और पेंटिंग कर रहे थे। सुधा भी इस काम में बढ़-चढ़कर हाथ बंटा रही थी। जब मेरे कमरे की पेंटिंग की बारी आई, तो मैं काफी कन्फ्यूज था कि कौन सा रंग लगाऊं – बेज, हल्का नीला, या हरा? तभी सुधा ने आकर एक खूबसूरत सा शेड चुना – हल्का लैवेंडर – और मुझे बताया। हैरानी की बात यह थी कि वही रंग मेरे दिमाग में भी घूम रहा था, जैसे हमारे विचार एक हो गए हों। यह एक छोटी सी बात थी, लेकिन इसने मेरे दिल को छू लिया। मुझे सुधा अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत, समझदार और आकर्षक लगने लगी थी।

दूसरे दिन मैं अपने कमरे में अकेला पेंटिंग कर रहा था। सुबह के 10 बज रहे थे और धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। मेरे कपड़ों पर और चेहरे पर रंग के छींटे पड़ गए थे। शर्ट और जींस पर पेंट लग गया था, और मेरे गाल पर नीले रंग का एक छींटा था। तभी सुधा हाथ में चाय का कप लेकर आई। वह एक पीले रंग की साड़ी पहने हुए थी जिसमें वह बहुत सुंदर लग रही थी। “लो, थोड़ा आराम कर लो, बहुत थक गए होगे।” उसने कहा और गर्म चाय मुझे पकड़ा दी। चाय की खुशबू ने मेरी थकान को हल्का कर दिया।

मैं चाय की चुस्की लेते हुए उसे देखने लगा। उसने मेरे हाथ से ब्रश लिया और खुद सीढ़ी पर चढ़कर दीवार के ऊपरी हिस्से को पेंट करने लगी। उस वक्त उसका फिगर देखते ही बनता था। वह 34-30-36 की सुडौल काया की मालकिन थी। जब वह सीढ़ी पर हाथ ऊपर करके पेंटिंग कर रही थी, तो उसकी साड़ी का पल्लू खिसक गया था और उसकी गोरी, चिकनी कमर दिख रही थी। उसकी कमर का लचक और उसकी आँखों की गहराई मुझे अपनी ओर खींच रही थी। उसे देखते हुए मुझे एक अजीब सा सुकून और उत्तेजना महसूस हो रही थी। मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा और मैं समझ गया कि मैं उसके प्यार में पड़ रहा हूँ, या शायद पड़ चुका हूँ।

अगले ही पल वह पेंट का ब्रश डिब्बे में डालने के लिए झुकी और उसका पैर सीढ़ी से फिसल गया। “आह…” उसकी चीख निकल गई – एक तेज़, डरावनी चीख। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मैंने चाय का कप वहीं फेंक दिया (बाद में मुझे मालूम पड़ा कि वह फर्श पर गिरकर टूट गया) और फुर्ती से आगे बढ़कर उसे हवा में ही लपक लिया। वह पूरी तरह से मेरी बाहों में थी, मेरे सीने से चिपकी हुई। उसकी साड़ी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके बाल बिखर गए थे। उसकी साँसें तेज थीं और उसकी आँखें डर के मारे फैली हुई थीं। नीचे चाय का कप टूटने की जोरदार आवाज आई। माँ ने रसोई से आवाज लगाई, “क्या हुआ राज? कोई गिर तो नहीं गया?” मैंने सुधा को अपनी बाहों में जकड़े हुए ही जवाब दिया, “कुछ नहीं माँ, बस हाथ से कप छूट कर गिर गया।”

सुधा ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं और मेरी तरफ देखा। एक मीठी सी मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई और वह बोली, “हमेशा मुझे बचाओगे क्या ऐसे ही?” उस वक्त उसकी बातों का जादू मेरे सर चढ़कर बोल रहा था। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं, और उनमें सिर्फ प्यार था। मैंने न जाने किस हिम्मत से कहा, “हाँ, हमेशा।” उसने अपनी आँखें थोड़ी सिकोड़ी और मेरे और करीब आकर बोली, “सच में?” मैंने उसकी गहरी आँखों में देखा और बिना कुछ सोचे-समझे उसे अपने गले से लगा लिया। उसके शरीर की गर्माहट, उसकी त्वचा की खुशबू, सब कुछ मुझे अपने अंदर समा रहा था। “हाँ, हमेशा। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। आई लव यू, सुधा।”

यह सुनते ही वह मेरी बाँहों में कटी हुई डाली की तरह पूरी तरह ढीली पड़ गई। जैसे उसके पैरों से ज़मीन खिसक गई हो। मैंने उसकी ठोड़ी पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर उठाया और फिर से कहा, “आई लव यू।” उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी पलकें झुका लीं और शरमाते हुए वहाँ से भाग गई। उसके जाने के बाद भी मैं कुछ देर तक उसी तरह खड़ा रहा, उसके स्पर्श का एहसास लिए हुए।

उस दिन के बाद मैं बेचैनी से उसके दोबारा आने का इंतजार करने लगा। दीवाली के दिन जब वह शाम को पूजा के लिए आई, तो मैंने उसे एक कोने में रोक लिया। मैंने थोड़ी शिकायती लहजे में कहा, “मैंने तुम्हें प्रपोज किया था, घर आना बंद करने के लिए नहीं कहा था।” वह शरारत से मुस्कुराई और बोली, “अच्छा जी, तो आप अपनी मिसेज को मिस कर रहे थे?” उसकी यह बात सुनकर मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। उसने मुझे ‘मिसेज’ कहा था, मानो हम पहले से ही पति-पत्नी हों। मैंने कोहनी मारते हुए कहा, “हाँ, मिसेज राज।” यह नाम सुनकर वह लाल हो गई और उसने अपना सिर झुका लिया। उसके चेहरे की वह मासूमियत और होंठों की वह मुस्कान मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गई। हम दोनों ने साथ में दीवाली की पूजा की और पटाखे जलाए। आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी फैल रही थी, और मैंने सुधा के हाथ को अपने हाथ में ले लिया। उसने विरोध नहीं किया।

भाग 3: सुहागरात का इंतज़ार और जिस्म का मिलन

दीवाली के अगली सुबह, सुबह-सुबह जब पूरा घर सो रहा था – सभी को देर रात पटाखे जलाने की वजह से नींद आ रही थी – सुधा चाय बनाकर आई। उसने हल्का गुलाबी सलवार-सूट पहना हुआ था, और उसके बालों से चाय की पत्तियों की हल्की सी खुशबू आ रही थी। माँ को देने के बाद वह मेरे कमरे में दाखिल हुई। मैं वैसे तो जाग रहा था, लेकिन मैंने जानबूझ कर आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक करने लगा। मैं चाहता था कि वह मेरे करीब आए, कि वह मुझे छुए। जैसे ही वह मुझे जगाने के लिए झुकी – मैंने उसकी साँसों की गर्माहट अपने चेहरे पर महसूस की – मैंने उसे फिर से अपनी तरफ खींच लिया और एक जोरदार किस कर दी। इस बार वह घबराई नहीं, बल्कि उसने भी मेरे किस को महसूस किया – उसके होंठ मेरे होंठों के साथ चल रहे थे, और उसकी जीभ मेरी जीभ से मिल रही थी। फिर उसने मुझे धक्का देकर अलग किया और कहा, “राज, मैं बचपन से तुमसे प्यार करती हूँ। सिर्फ तुमसे। क्या तुम भी सच में मुझसे उतना ही प्यार करते हो?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “देख लो, मेरी आँखों में झूठ है क्या?” वह मुस्कुराई और बोली, “ठीक है।”

फिर हम दोनों की जिंदगी की गाड़ी अपनी-अपनी पटरी पर दौड़ पड़ी। मैं अपनी नौकरी पर वापस चला गया और वह भी। लेकिन इस बार हमारे दिल जुड़ चुके थे। हर दिन घंटों फोन पर बात होती थी – रात के 2-3 बजे तक, उसके बाद भी। हम एक-दूसरे के दिन की हर छोटी-बड़ी बात शेयर करते थे। छह महीने बाद जब मैं फिर से अपने घर पटना लौटा, तो पता चला कि सुधा भी आई हुई है, या शायद उसे पता था कि मैं आ रहा हूँ। अगली सुबह वह फिर से हाथ में चाय का कप लेकर मेरे कमरे में आई, बिल्कुल मेरी बीवी की तरह। इस बार मैं जगा हुआ था और उसका इंतजार कर रहा था। मैंने उससे पूछा, “पूरी लाइफ ऐसे ही मेरा ख्याल रखोगी?” उसने मेरी तरफ देखा और बोली, “तुम्हें अब भी पता नहीं है क्या?”

मैंने अपना चाय का कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के मेरी जूठी चाय से एक घूंट भरा और फिर उसी कप को मेरे होंठों से लगा दिया। यह हमारे रिश्ते की औपचारिक शुरुआत थी – हमने चाय पीकर अपने प्यार को सील कर दिया। फिर उसने प्यार से मेरे बालों में हाथ फेरा और बोली, “गुड बॉय। किस्सी चाहिए मेरे बाबू को?” और कहते ही वह झुकी और उसने मेरे होंठों पर एक जोरदार और रसीली किस कर दी – एक गहरी फ्रेंच किस, जिसमें हमारी जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं। उसी दिन मैंने उसकी मम्मी और अपने घरवालों से बात की और हमारी शादी की तारीख तय हो गई। पूरा मोहल्ला हैरान था कि बचपन का प्यार सच में शादी में बदल गया।

शादी की पहली रात।

कमरे में सजावट थी – हर तरफ गुलाब की पंखुड़ियाँ, मोमबत्तियों की हल्की रोशनी, और एक मीठी सी खुशबू। जब मैं कमरे में दाखिल हुआ, तो सुधा पहले से ही लाल रंग के सुंदर से गाउन में तैयार होकर बैठी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “आप भी चेंज कर लीजिए पतिदेव।” यह पहली बार था जब उसने मुझे इस नाम से बुलाया था और यह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा – यह हमारी असली सुहागरात थी, भले ही हम पहले जिस्म से मिल चुके थे, लेकिन आज हम पति-पत्नी थे। जब मैं कपड़े चेंज करके आया, तो देखा कि उसने हमारे लिए वाइन के दो गिलास तैयार किए हुए थे। हमने हल्की-फुल्की बातें कीं और फिर थकान की वजह से एक दूसरे की बाँहों में बिना कुछ किए सो गए।

सुबह करीब 4:30 बजे हल्की रोशनी में मेरी आँख खुली। बाहर अभी भी अंधेरा था, लेकिन कमरे में मोमबत्तियों की रोशनी से एक सुनहरी चमक फैली हुई थी। मैंने देखा कि सुधा ने मुझे कस कर पकड़ रखा था – उसकी बाहें मेरे कंधों पर थीं, और उसका चेहरा मेरे सीने से चिपका हुआ था। मेरे हिलने पर वह भी जाग गई। उसने कोई बात नहीं की, बस मेरी गर्दन अपनी तरफ खींची और एक लंबी और गहरी फ्रेंच किस कर ली। उसकी उंगलियाँ मेरे बालों में फंस गई थीं, और उसके होंठों की गर्माहट मेरे होंठों में उतर रही थी। फिर उसने कान में फुसफुसाते हुए कहा, “ये तो हुआ मेरे हक का… अब आप कुछ पिएंगे, पतिदेव?”

मैं समझ गया कि वह क्या चाहती है। मैंने उसे अपनी गोद में खींच लिया। वह सीने से सीना लगाकर ऐसे बैठ गई जैसे चंदन की लकड़ी से लिपटा हुआ साँप – उसके शरीर की हर लकीर मेरे शरीर से मिल रही थी। मैंने उसकी गर्दन के पीछे हल्के से किस किया, जिससे उसके शरीर में बिजली सी दौड़ गई – वह सिहर उठी। मैंने पीछे से उसके गाउन का स्ट्रैप खोल दिया और मेरे दोनों हाथ आगे आकर उसके नर्म पेट को सहलाने लगे। उसका पेट गोरा, मुलायम और बिल्कुल चिकना था। उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी ब्रा के ऊपर ही अपने उभरे हुए मम्मे पर रख दिया। मैंने ब्रा के ऊपर से ही उसकी कड़क उठी चूची को हल्के से निचोड़ा। “आह्ह्ह…” एक गर्म सिसकारी उसके मुँह से निकल गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं और उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।

अब हमारी बेचैनी अपने चरम पर थी। वह मेरी गोद से उतरी और मेरे ऊपर चढ़कर मुझे पागलों की तरह चूमने लगी – मेरे होंठ, मेरी गर्दन, मेरे कंधे। किस करते-करते उसके होंठ मेरी छाती से होते हुए मेरे पेट तक पहुँच गए। मैं उसकी चूचियों को मसल रहा था – उन्हें दबा रहा था, छोड़ रहा था, फिर से दबा रहा था। उसने एक ही झटके में मेरी चड्डी उतार दी और मेरा तना हुआ 6 इंच का लंड उसके सामने था – सख्त, नसों से भरा, और सुपारे से पानी टपक रहा था। उसने प्यार से उसे अपने हाथ में लिया और मुठ मारते हुए बोली, “बचपन से एक ही सपना था राज, बस तुम्हारी होना है। तुम्हारे लिए ही सब कुछ बचा कर रखा है।” इतना कहकर उसने मेरे लौड़े को अपने गर्म मुँह में भर लिया और जोर-जोर से चूसने लगी। उसकी जीभ मेरे सुपारे को गोल-गोल घुमा रही थी, और उसके होंठ मेरे लंड को कसकर पकड़ रहे थे। वह बड़ी एक्सपर्ट की तरह मेरे सुपारे को जीभ से सहला रही थी। मैंने उसके बालों में हाथ डालकर उसके सिर को थोड़ा और नीचे दबाया, जिससे उसका मुँह और गहराई तक मेरे लंड को ले गया।

जब मुझे लगा कि अब मैं ज्यादा देर कंट्रोल नहीं कर पाऊँगा और उसके मुँह में ही निकल जाऊँगा, तो मैंने उसे ज़ोर से उठाया और बेड पर पटक दिया। मैंने उसकी ब्रा और पैंटी फाड़ कर अलग कर दी। उसकी गुलाबी और रसीली चूत मेरे सामने थी – गीली, चमकती हुई, और उसके लिप्स मोटे और खुले हुए थे। वह शर्म से अपनी जाँघें भींच रही थी, लेकिन मैंने उसके पैरों को धीरे-धीरे खोल दिया। मैंने उसे दीवार से लगा दिया और उसकी एक चूची मुँह में लेकर दूसरी को मसलने लगा। मेरा दूसरा हाथ उसकी गीली चूत पर था – उसकी चूत से रस टपक रहा था, मेरी उंगलियाँ गीली हो गई थीं। “प्लीज पतिदेव, अब और मत तड़पाओ… अंदर डाल दो ना,” उसने कराहते हुए गिड़गिड़ाया। उसकी आवाज़ में बेचैनी थी, एक प्यास थी जो सिर्फ मेरे लंड से बुझ सकती थी।

मैंने उसे बेड पर लिटा दिया और उसकी चूत चाटने लगा। उसकी चूत का स्वाद – नमकीन, थोड़ा मीठा, और बहुत ही मादक। मेरी जीभ उसकी क्लिट पर गोल-गोल घूम रही थी, और मैं उसकी चूत के रस को पी रहा था। वह पागलों की तरह मचल रही थी, उसके हाथ मेरे बालों में थे और वह मेरा सिर अपनी चूत पर दबा रही थी। फिर मैंने अपने लंड को उसकी चूत के द्वार पर रखा। वह पहले से ही पानी से पूरी तरह भीगी हुई थी। मैंने एक ज़ोरदार झटका दिया और एक ही बार में जड़ तक अंदर पेल दिया। “आह्ह्ह… माँ!” सुधा के मुँह से एक तेज़ चीख निकली और उसके नाखून मेरी पीठ में गहरे धंस गए – इतने गहरे कि मुझे लगा खून निकल आएगा। उसकी आँखों में आँसू और दर्द था – उसकी चूत से हल्का सा खून भी आ रहा था, उसके कौमार्य का प्रमाण – लेकिन वह कुछ नहीं बोली। मैंने उसके बालों को सहलाते हुए प्यार से कहा, “बस थोड़ी देर में दर्द गायब हो जाएगा। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, सुधा।”

उसने अपने आँसू पोंछे और आँखों ही आँखों में मुझे इशारा किया, “आगे बढ़ो, राज।” मैंने धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। हर एक झटके के साथ वह ढीली पड़ती जा रही थी और दर्द की जगह उत्तेजना ले रही थी। उसकी चूत की गर्माहट, उसकी दीवारों का मेरे लंड को कसना – सब कुछ अद्भुत था। फिर मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और उसकी चूत में लंड पेल दिया – मेरा चेहरा उसके स्तनों के बीच था, और मैं उसके निप्पल चूस रहा था। इस पोजीशन में मेरा लौड़ा सीधा उसकी कोख में ठोकर मार रहा था। वह चिल्ला उठी, “अब्बा… पतिदेव मर गई मैं… और नहीं… आह्ह्ह… और करो…” उसके शरीर में एक जोरदार कंपकंपी हुई और वह पहली बार झड़ गई – उसकी चूत ने मेरे लंड को जोर से दबाया और उसका गर्म रस मेरे लंड पर बह आया।

मैंने उसे फिर से दीवार से लगा दिया। वह हवा में लटकी हुई थी – उसके पैर मेरी कमर में लिपटे हुए थे, और मैं नीचे से उसे ज़ोर-ज़ोर से चोद रहा था। उसके स्तन मेरे चेहरे पर उछल रहे थे, और मैं उन्हें चूस रहा था। काफी देर तक चुदाई चलती रही। फिर मैं थक गया और हम दोनों वैसे ही लेट गए। इस बार सुधा मेरे ऊपर चढ़ गई और अपनी गांड हिला-हिला कर चूत में लंड लेने लगी। उसकी चाल धीमी और गहरी थी – वह मेरे लंड पर ऊपर-नीचे हो रही थी, और मैं उसकी दोनों चूचियाँ पकड़ कर ज़ोर से दबा रहा था। “आह… हाँ… अब बस आ ही गया… चोदो मुझे,” वह चीखती हुई एक बार फिर झड़ गई और मेरा पहला माल उसकी चूत के अंदर ही रिस गया – गर्म, गाढ़ा, और ढेर सारा।

हम दोनों पसीने से लथपथ बेड पर पड़े थे। हमारी साँसें फूल रही थीं, हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे। फिर मैंने उसे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया। शॉवर के नीचे गर्म पानी बह रहा था। पानी के बीच फिर से हमारे जिस्म एक दूसरे से लिपट गए और बहुत देर तक चुदाई का सिलसिला चलता रहा – पहले चूत में, फिर मुँह में, और फिर शॉवर की दीवार से लगाकर फिर से चूत में। उस रात हमने सेक्स के हर रंग देखे – प्यार, दर्द, जुनून, और वह अद्भुत सुख जो सिर्फ दो जिस्मों के मिलन से आता है।

भाग 4: शादी की पहली सुबह की चुदाई

सुबह की पहली किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। कमरा धीरे-धीरे रोशन हो रहा था, और मैं धीरे-धीरे जाग रहा था। रात भर की चुदाई के बाद हम दोनों नंगे ही एक-दूसरे से लिपटकर सोए थे। सुधा अभी भी मेरी बाहों में सिमटी हुई थी, उसका सिर मेरे सीने पर था, और उसके बाल मेरी छाती पर बिखरे हुए थे। उसके शरीर की गर्माहट अभी भी मुझमें समाई हुई थी, और उसकी साँसों की हल्की-हल्की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी।

मैंने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं और सुधा को देखा – वह सो रही थी, बिल्कुल मासूमियत से। उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी, और उसके गाल गुलाबी हो रहे थे। मैं उसे देखता रहा – बस देखता रहा। कितनी खूबसूरत है, मेरी सुधा। बचपन की वह मासूम सहेली आज मेरी पत्नी है, मेरी रानी है। और आज हमारी शादी की पहली सुबह है।

मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उसके चेहरे से बालों की एक लट हटाई। उसके गालों को धीरे-धीरे सहलाया। उसकी त्वचा – रेशम की तरह नर्म और मुलायम। फिर मेरी नज़र उसके होंठों पर गई – वही होंठ जिन्होंने कल रात मेरे लंड को चूसा था, वही होंठ जिनसे उसने मुझसे प्यार कहा था। मैं झुका और उसके होंठों पर एक हल्का सा किस किया – इतना हल्का कि वह जागी नहीं।

तभी मेरा ध्यान मेरे नीचे के हिस्से पर गया। मेरा लंड पहले से ही सख्त और खड़ा था – सुबह-सुबह का नशा, उसके नंगे शरीर का स्पर्श, और कल रात की यादें – सब कुछ मिलकर मुझे पागल कर रहा था। मैंने अपने लंड को उसकी गांड के बीच रख दिया – उसकी चिकनी, गोरी गांड के बीच। वह अभी भी सो रही थी, बेखबर।

मैंने धीरे-धीरे अपने कूल्हों को हिलाना शुरू किया। मेरा लंड उसकी गांड के बीच फिसल रहा था, और हर बार उसके गांड के छेद को हल्का सा छू रहा था। मैं उसे जगाना नहीं चाहता था, लेकिन मैं खुद को रोक भी नहीं पा रहा था। उसके शरीर की गर्माहट, उसकी त्वचा की खुशबू – सब कुछ मुझे और बेकरार कर रहा था।

धीरे-धीरे, शायद मेरे हिलने की वजह से, सुधा की आँखें खुलने लगीं। उसने अपनी आँखें मलीं और मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी।

“राज… सुबह-सुबह ही शरारतें शुरू?” उसने नींद भरी आवाज़ में कहा।

मैंने उसके कान के लोब को हल्के से काटा और कहा, “सुबह-सुबह का कसरत सबसे अच्छा होता है, सुधा। तुम्हें पता नहीं?”

“तुम्हारी कसरत ने कल रात ही मेरी चूत फाड़ कर रख दी थी। अब सुबह-सुबह और?” उसने शिकायती लहजे में कहा, लेकिन मैं जानता था कि वह भी चाह रही थी – उसके शरीर की गर्माहट बता रही थी।

मैं हँसा। मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उसके होंठों पर एक लंबी, गहरी किस कर दी। मेरी जीभ ने उसके होंठों को खोला, और हमारी जीभें फिर से एक-दूसरे से मिलने लगीं। मैंने उसके स्तन को अपने हाथ में लिया और उसे दबाने लगा – धीरे-धीरे, प्यार से। उसका निप्पल मेरी हथेली पर कड़क हो गया था। मैं अपना हाथ उसके स्तन पर गोल-गोल घुमा रहा था, और उसकी साँसें तेज़ होने लगीं।

“तुम कितनी शरारती हो, सुधा,” मैंने उसके होंठों से अपने होंठ हटाते हुए कहा। “बोलती कुछ और हो, लेकिन तुम्हारा शरीर कुछ और ही कह रहा है। तुम्हारी चूत पहले से ही गीली है।”

मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उसकी चूत पर रखा तो वह सच में गीली थी – कल रात के रस का कुछ हिस्सा अभी भी बचा हुआ था, और मेरे स्पर्श ने उसे और गीला कर दिया था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने आप को मेरे हवाले कर दिया।

मैंने सुधा को धीरे से पीठ के बल लिटा दिया। अब वह मेरे नीचे थी – पूरी तरह नंगी, सुबह की हल्की रोशनी में। मैंने उसका चेहरा देखा – उसकी बंद आँखें, उसके खुले होंठ, उसके गुलाबी गाल। फिर मेरी नज़र उसकी गर्दन पर गई, फिर उसके स्तनों पर, फिर उसके पेट पर, और फिर उसकी चूत पर – जो गीली और चमक रही थी, और उसके लिप्स थोड़े खुले हुए थे, जैसे मेरे लंड का स्वागत करने के लिए तैयार हों।

“तुम बहुत खूबसूरत हो, सुधा,” मैंने कहा और फिर झुककर उसके स्तनों को चूमने लगा।

मैंने पहले उसके बाएँ स्तन को अपने मुँह में लिया। उसके निप्पल को अपनी जीभ से गोल-गोल घुमाया, फिर उसे हल्के से दबाया, फिर चूसा। मेरी जीभ उसके निप्पल पर दौड़ रही थी, और मेरे दाँत उसे हल्के-हल्के काट रहे थे। मेरा दूसरा हाथ उसके दाएँ स्तन पर था – उसे दबा रहा था, मसल रहा था।

“आह्ह… राज… धीरे…” सुधा कराह उठी।

मैंने उसकी बात नहीं मानी। मैं और जोर से चूसने लगा। उसके निप्पल मेरे मुँह में और भी कड़क हो गए थे। सुधा अपनी पीठ झुका रही थी, अपने स्तन मेरे मुँह में और गहराई तक धकेल रही थी। वह अब पूरी तरह से मेरी दीवानी हो चुकी थी – उसकी साँसें तेज़ थीं, और उसके मुँह से हल्की-हल्की कराहें निकल रही थीं।

फिर मैंने धीरे-धीरे अपना मुँह उसके पेट की तरफ ले जाना शुरू किया। मैंने उसकी नाभि को चूमा – वहाँ उसकी त्वचा बहुत नर्म थी। फिर उसके नीचे के हिस्से को – जहाँ उसके पेट की मांसपेशियाँ हल्की-सी उभरी हुई थीं। और फिर मैं वहाँ आ गया – उसकी चूत पर।

मैंने उसकी दोनों जांघों को पकड़ा, उन्हें थोड़ा और खोला, और फिर अपना मुँह सीधे उसकी चूत पर रख दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह्ह! राज!” सुधा चीख पड़ी। उसकी यह चीख सुनकर मुझे और जोश आ गया।

मैंने अपनी जीभ से उसकी चूत के बाहरी लिप्स को चाटा – ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। उसकी चूत का स्वाद – नमकीन, थोड़ा मीठा, और बहुत ही मादक। फिर मैंने अपनी जीभ उसके अंदरूनी लिप्स पर डाली, और फिर सीधे उसकी क्लिटोरिस पर। मैंने उसकी क्लिट को अपने होंठों के बीच लिया और धीरे-धीरे चूसने लगा। मेरी जीभ उसकी क्लिट पर गोल-गोल घूम रही थी, और मेरे होंठ उसे दबा रहे थे।

“और… और… राज… और चाटो… मेरी चूत को और चाटो…” सुधा चिल्ला रही थी। उसके हाथ मेरे बालों में थे, और वह मेरा सिर अपनी चूत पर और जोर से दबा रही थी।

मैंने अपनी जीभ और तेज़ कर दी। मैंने अपनी जीभ को उसकी चूत के अंदर – गहराई तक – घुसाना शुरू कर दिया। उसकी चूत की दीवारें मेरी जीभ को कस रही थीं, और उसकी चूत का गर्म रस मेरे मुँह में बह रहा था। मैं उसका सारा रस पी रहा था – गटक-गटक कर – जैसे कोई प्यासा आदमी पानी पीता है।

कुछ ही मिनटों में सुधा के शरीर में कंपन होने लगा। उसने मेरे बालों को और जोर से पकड़ा – इतना जोर से कि मुझे हल्का दर्द हुआ – और फिर एक लंबी, गहरी कराह के साथ वह चरमसुख पर पहुँच गई। “आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!” उसकी चीख पूरे कमरे में गूंज गई। उसकी चूत ने मेरी जीभ पर अपना गर्म रस छोड़ दिया, और मैंने उसे पी लिया – पूरा का पूरा।

“अब मेरी बारी है,” सुधा ने हाँफते हुए कहा।

वह मुझे अपनी तरफ घुमाने लगी। मैं उसके ऊपर लेट गया, और वह मेरे लंड पर झुक गई। मेरा लंड पहले से ही सख्त और तना हुआ था – उसकी चूत चाटने से और भी सख्त हो गया था। उसने मेरे लंड को अपने हाथ में लिया – उसके हाथ गर्म और नर्म थे – और प्यार से सहलाने लगी। उसकी उंगलियाँ मेरे लंड के शाफ्ट पर ऊपर-नीचे जा रही थीं, और मेरे सुपारे से प्री-कम टपकने लगा था।

फिर उसने मेरे सुपारे को अपने होंठों से छुआ, फिर चूमा, और फिर उसे अपने मुँह में ले लिया।

“आह्ह… सुधा…” मैं कराह उठा।

उसने मेरे लंड को अपने मुँह में गहराई तक लेना शुरू कर दिया। उसकी जीभ मेरे लंड के सुपारे पर गोल-गोल घूम रही थी, और उसके होंठ मेरे लंड को कसकर पकड़ रहे थे। उसने अपना सिर ऊपर-नीचे किया – धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर और तेज़। मेरा लंड उसके गले तक जा रहा था, और उसे उबकाई आ रही थी – मैं देख सकता था – लेकिन वह रुकती नहीं थी। वह मुझे पूरा चूसना चाहती थी।

मेरे हाथ उसके बालों में थे, और मैं उसका सिर थोड़ा और नीचे दबा रहा था। मेरी साँसें तेज़ हो गई थीं, और मैं जोर-जोर से कराह रहा था। “सुधा… और… और चूस… बहुत अच्छा कर रही हो… मेरी जान…”

मैं चाहता था कि मैं उसके मुँह में ही झड़ जाऊँ, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया। मैं उसकी चूत को फिर से चोदना चाहता था। मैंने उसका सिर पकड़कर उसे रोक दिया। “अभी नहीं,” मैंने हाँफते हुए कहा। “अभी तुम्हारी चूत चोदनी है।”

मैंने उसे उठाया और पीठ के बल लिटा दिया। फिर मैं उसके ऊपर आ गया, और अपना लंड उसकी चूत के द्वार पर रख दिया। मैंने उसकी आँखों में देखा – उसकी आँखों में प्यार था, चाहत थी, और थोड़ी सी शरारत भी थी। फिर मैंने धीरे-धीरे – बहुत धीरे – अपना लंड उसकी चूत में अंदर धकेलना शुरू किया।

“आह्ह…” सुधा ने कराहते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं।

मेरा लंड उसकी चूत में आसानी से फिसल रहा था। कल रात की चुदाई ने उसकी चूत को पूरी तरह से तैयार कर दिया था – वह अब मेरे लंड के लिए खुल चुकी थी, और उसकी गर्माहट मेरे लंड को अंदर तक समा रही थी। मैंने अपना पूरा लंड अंदर डाल दिया और फिर वहीं रुक गया। मैं उसके अंदर लंड डाले हुए खड़ा था, और उसने मेरी कमर को अपने पैरों से जकड़ लिया था। मैंने उसके माथे पर किस किया और बोला, “बहुत अच्छी हो, सुधा।”

फिर मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। पहले बहुत धीरे – जैसे कोई बहुत कीमती चीज़ को छू रहा हो। फिर थोड़ा तेज़, फिर और तेज़। मेरी गति बढ़ती जा रही थी, और सुधा नीचे से अपने कूल्हे हिला रही थी – हमारे शरीर एक साथ चल रहे थे, एक लय में, जैसे हम दोनों एक ही शरीर हों।

“राज… आह्ह… और तेज़…” सुधा कराह उठी।

मैंने अपनी गति और तेज़ कर दी। अब मैं उसे ‘घपा-घप’ चोद रहा था – मेरे धक्के जोरदार और गहरे थे, और उसके स्तन हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे। वैसे तो उसके स्तन बहुत बड़े नहीं थे, लेकिन वे बिल्कुल टाइट और सुडौल थे, और उनका उछलना देखने लायक था। मैंने उन्हें अपने हाथों में ले लिया – दोनों को – और उन्हें दबाने लगा। मेरे अंगूठे उसके निप्पल को दबा रहे थे, और बाकी उंगलियाँ उसके स्तनों को मसल रही थीं। सुधा ने अपने नाखून मेरी पीठ में गड़ा दिए – थोड़े दर्द से, लेकिन मैं रुका नहीं।

“चिल्लाओ, सुधा,” मैंने कहा। “कोई सुनने वाला नहीं है।”

“आह्ह्ह्ह्ह्ह! राज! मैं झड़ने वाली हूँ!” वह चीख पड़ी।

“रुको मत… आने दो…” मैंने कहा और और तेज़ चोदने लगा। मैं उसकी चूत में अपना लंड लगातार अंदर-बाहर कर रहा था – हर बार पूरा अंदर, हर बार पूरा बाहर, सिर्फ सुपारा अंदर छोड़कर, फिर पूरा अंदर।

लगभग दस मिनट तक मैंने उसे इसी तरह चोदा। फिर उसके शरीर में कंपन होने लगा – पहले हल्का, फिर तेज़, फिर बहुत तेज़। उसने मेरी पीठ को और जोर से पकड़ लिया, और फिर एक लंबी, गहरी कराह के साथ वह चरमसुख पर पहुँच गई – इस बार और जोरदार। उसकी चूत ने मेरे लंड को जोर से दबाया – इतना जोर से कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं भी उसी पल झड़ गया – मेरा गर्म वीर्य उसकी चूत के अंदर भर गया, और मैंने उस गर्माहट को अपने पूरे लंड में महसूस किया। एक बार, दो बार, तीन बार – मैं अंदर ही अंदर झड़ता रहा।

हम दोनों हाँफ रहे थे, एक-दूसरे से लिपटे हुए। मेरा लंड अभी भी उसकी चूत के अंदर था, धीरे-धीरे नरम हो रहा था। मैंने उसके होंठों पर एक और किस किया – प्यार भरी, गहरी किस – और कहा, “गुड मॉर्निंग, मेरी जान।”

“गुड मॉर्निंग, मेरे राजा,” सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आँखें अभी भी बंद थीं, और उसके चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि थी।

हम कुछ देर ऐसे ही लेटे रहे – नंगे, गर्म, और पूरी तरह से संतुष्ट। मैं उसके बालों में हाथ फेरता रहा, और वह मेरी छाती पर अपना सिर रखे रही। फिर हम उठे और साथ में बाथरूम गए। मैंने उसे नहलाया – मैंने उसके बाल धोए, मैंने उसके शरीर पर साबुन लगाया, और मैंने उसकी चूत को अच्छी तरह से साफ किया। उसने भी मुझे नहलाया – उसने मेरे लंड को धोया, उसने मेरी छाती पर हाथ फिराया, और उसने मुझे प्यार से सहलाया।

जब हम बाथरूम से बाहर आए, तो सुबह की तेज़ धूप कमरे में आ रही थी। हमने कपड़े पहने – सुधा ने एक हल्का सा लाल सूट पहना, और मैंने एक सफेद टी-शर्ट और जींस पहनी। फिर हम साथ में बैठकर चाय पीने लगे। हमारे बीच कोई शर्म नहीं थी, कोई झिझक नहीं थी। बस प्यार था, और एक-दूसरे के लिए चाहत थी।

मैंने सुधा की तरफ देखा और कहा, “सुधा, मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद की सुबह इतनी खूबसूरत हो सकती है।”

उसने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “यह तो अभी शुरुआत है, राज। हमारे पूरे जीवन में ऐसी हजारों सुबहें आएंगी।”

“मुझे उम्मीद है कि हर सुबह ऐसी ही होगी,” मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।

“हर सुबह तुम मुझे चोदोगे?” उसने शरारत से पूछा।

मैं हँसा और बोला, “हर सुबह, हर दोपहर, हर रात। तुम थक जाओगी, पर मैं नहीं थकूंगा।”

“फिर तो मैं भी तुम्हारे साथ ही थकूंगी,” उसने कहा और अपनी उंगलियाँ मेरी उंगलियों में फँसा लीं।

वो सुबह हमारी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबहों में से एक थी। बचपन का वो मासूम प्यार, लॉकडाउन में पनपी वो करीबियाँ, और फिर शादी के बाद की यह जंगली और प्यार भरी सुबह – सब कुछ एक सपने की तरह लग रहा था। लेकिन यह सपना सच था, और हम दोनों इस सच्चाई को पूरी ज़िंदगी जीना चाहते थे।

बस फिर क्या था – हमारी चुदाई का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। दिन में जब घर में सन्नाटा होता, हम चुपके से मिलते। रात को जब सब सो जाते, हम फिर से एक-दूसरे में खो जाते। हमने हर पोजीशन ट्राई की, हर जगह चुदाई की – बेड पर, सोफे पर, बाथरूम में, कभी-कभी तो रसोई में भी, जब मैं सुधा को चाय बनाते हुए देखता और मेरा मन करता। उसकी चूत अब मेरे लंड के लिए पूरी तरह से खुल चुकी थी, और उसकी गांड भी धीरे-धीरे मेरे लिए तैयार हो रही थी। मैंने वादा किया था कि जल्द ही मैं उसकी गांड भी चोदूंगा – और उस दिन का इंतजार भी मुझे अब उतना ही था जितना उसे।

मैं – राज – और मेरी सुधा – दो बचपन के प्यार, आज एक-दूसरे के पति-पत्नी थे, और हमारे बीच का प्यार हर गुजरते दिन के साथ और गहरा होता जा रहा था। शादी की पहली सुबह की यह चुदाई उस प्यार का एक और सबूत थी – एक ऐसा सबूत जो हमेशा हमारी यादों में बसा रहेगा।

इस तरह हमारी ज़िंदगी ख़ुशी से गुजरने लगी। मुझे एक ऐसी हॉट और समझदार बीवी मिली है जो बिस्तर में तूफान है और बाहर एक परफेक्ट लाइफ पार्टनर – वह मेरे मसालेदार खाने का ख्याल रखती है, मेरे गंदे मोजे धोती है, और रात को मेरे साथ नंगी होकर सोती है। सुधा आज भी हर सुबह मेरे लिए चाय लेकर आती है और मेरी देसी पत्नी बनकर मेरी हर चाहत को पूरा करती है। बचपन के प्यार से सुहागरात में चुदाई का वह मासूम प्यार आज शादीशुदा चुदाई के जुनून में बदल चुका है – और हम दोनों इस जुनून को जी रहे हैं, हर रात, हर सुबह, हर पल।

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