एक पत्नी का समर्पण– भाग 2 – यह कहानी है मेरी, आध्या की। मेरे पति का नाम राहुल है। भाग 1 में आपने पढ़ा कि कैसे मैंने अपने पति के सामने अपना सब कुछ रख दिया – अपना शरीर, अपना मन, और अपनी आत्मा। मैंने उन्हें अपनी मर्ज़ी से अपना इस्तेमाल करने दिया। मैंने वह सब किया जो उन्होंने कहा। मैंने उन्हें अपनी मालकियत दी। और उन्होंने मुझे वो सब दिया जो मैं चाहती थी – प्यार, दर्द, आनंद, और पूरा समर्पण। अब, भाग 2 में, आप पढ़ेंगे कि कैसे हमारे रिश्ते ने एक नया मोड़ लिया – कैसे राहुल ने मुझे पूरी तरह अपना बनाया, और कैसे हमने मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाई जहाँ सिर्फ हम दोनों थे। यह कहानी है उस अनुबंध की, उन नियमों की, और उस प्यार की – जिसने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि और मज़बूत बनाया। अगर आपको रोमांटिक बीडीएसएम, समर्पण, रफ सेक्स, और पति-पत्नी के गहरे प्यार की हिंदी कहानियाँ पसंद हैं, तो यह दास्तान सिर्फ आपके लिए है।
भाग 1: नए नियम, नई दुनिया – हमारा अनुबंध
उस रात के बाद, हमारे बीच कुछ बदल गया था। राहुल ने मुझे सिर्फ अपनी रखैल नहीं बनाया था – उन्होंने मुझे अपनी दुनिया का हिस्सा बनाया था। लेकिन साथ ही, उन्होंने कुछ नियम भी बनाए थे – ऐसे नियम जो हमारे रिश्ते को और गहरा बनाते थे। ये नियम सिर्फ शब्द नहीं थे – ये हमारे प्यार की भाषा थे, हमारे समर्पण का प्रतीक थे।
अगली सुबह, जब मैं उठी, तो राहुल बिस्तर पर मेरे बगल में बैठे थे। उनके हाथ में एक छोटी सी डायरी थी – गहरे भूरे रंग की, चमड़े से बनी हुई। सुबह की धूप खिड़की से आ रही थी, और उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी – जैसे उन्होंने पूरी रात कुछ सोचा हो। मैंने उन्हें देखा – उनकी आँखों में थकान थी, लेकिन साथ ही एक अजीब सी चमक भी थी।
“आध्या, आओ, बैठो,” उन्होंने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो मैंने पहले भी सुनी थी – लेकिन इस बार उसमें प्यार भी था।
मैं उनके पास बैठ गई। मेरा शरीर अभी भी पिछली रात के दर्द से कराह रहा था – लेकिन मेरे दिल में एक अजीब सी शांति थी। मैं जानती थी कि मैं उनकी हूँ – और यही सबसे ज़रूरी था। मेरे हाथ काँप रहे थे – लेकिन खुशी से, डर से नहीं।
उन्होंने डायरी मेरी तरफ बढ़ाई। उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों को छू गईं – और मुझे एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई।
“यह हमारा अनुबंध है,” उन्होंने कहा। “इसमें वो सब लिखा है जो मैं तुमसे चाहता हूँ – और वो सब जो मैं तुम्हें दूँगा। इसे पढ़ो, और अगर तुम सहमत हो, तो इस पर हस्ताक्षर करो।”
मैंने डायरी खोली। उसके पन्नों पर उनकी साफ-सुथरी लिखावट में कई बातें लिखी थीं। मैंने धीरे-धीरे पढ़ा – हर शब्द को अपने दिल में उतारते हुए:
“मैं, राहुल, वचन देता हूँ कि:
मैं तुम्हारी हर सीमा का सम्मान करूँगा – चाहे वो शारीरिक हो या भावनात्मक। मैं तुम्हें कभी वो नहीं करने दूँगा जो तुम नहीं चाहती।
मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा – चाहे हम कुछ भी करें। तुम मेरी हो, और मैं तुम्हारा।
मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा – लेकिन सिर्फ तुम्हारी भलाई के लिए।
मैं तुम्हें हर दर्द के बाद प्यार दूँगा – और हर आँसू के बाद चुंबन।
मैं तुम्हें कभी शर्मिंदा नहीं करूँगा – सिर्फ तुम्हें अपना बनाऊँगा।
मैं तुम्हारा हूँ – पूरी तरह से, हमेशा के लिए।”
“मैं, आध्या, वचन देती हूँ कि:
मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी – बिना किसी शर्त के।
मैं तुम्हें अपना सब कुछ दूँगी – अपना शरीर, अपना मन, और अपनी आत्मा।
मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगी – चाहे वो कितनी भी मुश्किल हो।
मैं तुम्हारे हर दर्द को सहूँगी – क्योंकि मैं जानती हूँ कि तुम मुझे कभी नहीं तोड़ोगे।
मैं तुम्हारी रखैल बनूँगी – और मुझे इस पर गर्व होगा।
मैं तुम्हारी हूँ – पूरी तरह से, हमेशा के लिए।”**
मैंने डायरी बंद की, और राहुल की तरफ देखा। उनकी आँखों में वो प्यार था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था – गहरा, शांत, और बेहद मज़बूत। उनकी आँखों में एक सवाल था – और एक वादा भी। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे – खुशी के आँसू।
“मैं सहमत हूँ,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। मैं जानती थी कि यह सही है – क्योंकि मैं उन पर भरोसा करती थी, पूरी तरह से।
राहुल ने मुझे एक कलम दी। मैंने डायरी के आखिरी पन्ने पर अपना नाम लिखा – आध्या। और फिर राहुल ने अपना नाम लिखा – राहुल। दोनों नाम एक-दूसरे के नीचे थे – जैसे दो जिस्म, एक आत्मा।
उन्होंने डायरी को अपनी बाँहों में भर लिया, और मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी धड़कन मेरे कानों में गूँज रही थी – धीमी, गहरी, और सुकून भरी। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं – और उस पल को जी भर के जिया।
“अब तुम मेरी हो,” उन्होंने फुसफुसाया। “पूरी तरह से।”
“और तुम मेरे हो,” मैंने कहा। “हमेशा के लिए।”
उस पल, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दुनिया की सबसे खुश औरत हूँ। मैं जानती थी कि आगे जो भी होगा – चाहे वो दर्द हो या आनंद – मैं अकेली नहीं हूँ। वो मेरे साथ हैं – और यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात थी।
भाग 2: पहला नियम – मेरी आवाज़, उनका आदेश
अनुबंध के बाद, राहुल ने मुझे कुछ नियम बताए – ऐसे नियम जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गए। ये नियम सिर्फ शब्द नहीं थे – ये हमारे प्यार की भाषा थे।
पहला नियम: जब हम घर में अकेले हों, तो मैं उन्हें “सर” कहूँगी। यह उनके प्रति मेरे समर्पण का प्रतीक था – और मेरे लिए यह कहना गर्व की बात थी।
पहली बार जब मैंने उन्हें “सर” कहा, तो मुझे एक अजीब सी शांति महसूस हुई। जैसे मैं सही जगह पर हूँ – जैसे मैं वही हूँ जो मुझे होना चाहिए। हम रसोई में थे – और मैं उनके लिए चाय बना रही थी।
“सर, आपकी चाय,” मैंने कहा, और उन्हें कप पकड़ाया।
उन्होंने कप लिया, और मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी – जैसे वो मुझे पहली बार देख रहे हों।
“अच्छी लड़की,” उन्होंने कहा। और मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो।
अब, जब भी हम घर में अकेले होते, मैं उन्हें “सर” कहती थी। यह मेरे लिए एक आदत बन गई थी – और मुझे इस पर गर्व था। जब मैं “सर” कहती थी, तो मेरे अंदर एक अजीब सी शांति उतरती थी – जैसे मैं सही जगह पर हूँ।
दूसरा नियम: जब वो घर आएँ, तो मैं उनके पैर छूकर उनका स्वागत करूँगी – चाहे वो कितने भी थके हों।
यह मेरे लिए एक रस्म बन गई थी – और मैं इसे पूरे मन से करती थी। जब मैं उनके पैर छूती थी, तो मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं उन्हें अपना सब कुछ सौंप रही हूँ। हर शाम, जब वो ऑफिस से लौटते, मैं दरवाज़े पर उनका इंतज़ार करती थी। जैसे ही वो अंदर आते, मैं झुककर उनके पैर छूती थी।
“स्वागत है, सर,” मैं कहती थी।
वो मेरे सिर पर हाथ रखते थे, और मुझे उठाते थे। “तुम मेरी अच्छी लड़की हो,” वो कहते थे। और मुझे ऐसा लगता था जैसे मैंने पूरी दुनिया जीत ली हो।
तीसरा नियम: जब वो कहें, तो मैं अपने कपड़े उतार दूँगी – बिना किसी सवाल के।
यह मेरे लिए आसान नहीं था – लेकिन मैंने इसे अपना लिया था। क्योंकि मैं जानती थी कि वो मेरी हर शर्म को प्यार से ढक लेंगे। पहली बार जब उन्होंने कहा, तो मैं झिझकी थी – लेकिन फिर मैंने उनकी आँखों में देखा, और मुझे भरोसा हो गया।
“कपड़े उतारो,” उन्होंने कहा था।
मैंने धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारे – पहले मेरी शर्ट, फिर मेरी पैंट। जब मैं सिर्फ अपनी ब्रा और पैंटी में थी, तो उन्होंने मेरी तरफ देखा – उनकी आँखों में वो हवस थी जो मुझे पसंद थी।
“सब कुछ,” उन्होंने कहा।
और मैंने सब कुछ उतार दिया। उस पल, मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने अपनी आखिरी शर्म भी उन्हें सौंप दी है – और मुझे इस पर कोई पछतावा नहीं था।
चौथा नियम: जब वो मुझे बुलाएँ, तो मैं तुरंत उनके पास आऊँगी – चाहे मैं कुछ भी कर रही होऊँ।
यह मेरे लिए एक चुनौती थी – लेकिन मैंने इसे स्वीकार किया था। क्योंकि मैं जानती थी कि वो मुझे कभी बेवजह नहीं बुलाएँगे। कभी-कभी, जब मैं नहा रही होती थी, तो वो मुझे बुलाते थे। मैं भीगे बालों और गीले शरीर के साथ उनके पास दौड़ती थी। और वो मुझे देखकर मुस्कुराते थे।
“तुम मेरी अच्छी लड़की हो,” वो कहते थे। और मुझे ऐसा लगता था जैसे मैंने कुछ बड़ा कर दिया हो।
कभी-कभी, जब मैं खाना बना रही होती थी, तो वो मुझे बुलाते थे। मैं गैस बंद करके उनके पास दौड़ती थी। और वो मुझे गले लगा लेते थे।
“बस तुम्हें देखना था,” वो कहते थे। और मेरा दिल भर आता था।
पाँचवाँ नियम: जब वो मुझसे कुछ कहें, तो मैं उनकी बात ध्यान से सुनूँगी – और उसे मानूँगी।
यह मेरे लिए सबसे मुश्किल नियम था – क्योंकि मैं हमेशा से अपनी बात कहने वाली लड़की रही थी। लेकिन मैंने इसे सीखा – क्योंकि मैं जानती थी कि वो मेरी भलाई के लिए ही कहते हैं।
पहली बार जब उन्होंने मुझे कुछ कहा, तो मैंने बहस करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मेरी तरफ देखा – और उनकी आँखों में वो प्यार था जिसने मुझे चुप करा दिया।
“मैं तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूँ, आध्या,” उन्होंने कहा।
और मैंने उनकी बात मान ली। उस दिन के बाद, मैंने कभी उनसे बहस नहीं की – क्योंकि मैं जानती थी कि वो मुझसे प्यार करते हैं, और वो कभी मेरा बुरा नहीं चाहेंगे।
इन नियमों ने हमारे रिश्ते को एक नई दिशा दी। अब हम सिर्फ पति-पत्नी नहीं थे – हम मालिक और रखैल थे। और मुझे इस पर गर्व था – क्योंकि मैं जानती थी कि यह सिर्फ एक खेल नहीं था, यह हमारा प्यार था।
भाग 3: वो रात – जब उन्होंने मुझे पूरी तरह अपना बनाया
कुछ दिन बाद, राहुल ने मुझे बेडरूम में बुलाया। जब मैं अंदर गई, तो उन्होंने मुझे बिस्तर पर बैठने का इशारा किया। कमरे में हल्की रोशनी थी – मोमबत्तियों की रोशनी, जो दीवारों पर नाच रही थी। और एक अजीब सी शांति थी – जैसे पूरा कमरा हमारा इंतज़ार कर रहा हो।
“आज मैं तुम्हें कुछ नया सिखाऊँगा,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी – और साथ ही एक गहरा प्यार भी।
“जो आप कहें, सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा किया, और मेरे कपड़े उतारने लगे – धीरे-धीरे, एक-एक करके। पहले मेरी शर्ट, फिर मेरी ब्रा, फिर मेरी स्कर्ट, और फिर मेरी पैंटी। जब मैं पूरी तरह नंगी हो गई, तो उन्होंने मुझे घूरा – जैसे कोई कलाकार अपनी सबसे कीमती कृति को देख रहा हो। उनकी आँखों में वो हवस थी जो मुझे पसंद थी – लेकिन उससे भी ज़्यादा, उनकी आँखों में प्यार था।
“तुम कितनी सुंदर हो,” उन्होंने फुसफुसाया। उनकी उँगलियाँ मेरे गालों को सहलाने लगीं – धीरे-धीरे, जैसे कोई नाजुक फूल छू रहा हो। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं – और उनके स्पर्श को महसूस किया।
उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और मेरे पूरे शरीर को चूमना शुरू किया – मेरे माथे से लेकर मेरे पैरों तक। उनके होंठ मेरे हर अंग को छूते थे – मेरी गर्दन, मेरे स्तन, मेरा पेट, मेरी जाँघें, और मेरी योनि। हर चुंबन के साथ, मुझे ऐसा लगता था जैसे वो मेरे शरीर को अपना बना रहे हैं – एक-एक इंच।
जब उनके होंठ मेरी योनि पर पहुँचे, तो मैंने कराहना शुरू किया। उन्होंने अपनी जीभ मेरी योनि के अंदर डाली, और मुझे चाटने लगे – धीरे-धीरे, फिर तेज़। मैं उनकी जीभ के नीचे तड़पने लगी। मेरे हाथ उनके बालों में चले गए – और मैंने उन्हें अपनी तरफ खींच लिया।
“सर.. प्लीज़..” मैंने कराहते हुए कहा।
“प्लीज़ क्या?” उन्होंने पूछा, बिना रुके। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी शरारत थी।
“प्लीज़.. मुझे..” मैं और नहीं कह पाई। मेरी साँसें तेज़ हो चुकी थीं, और मेरा शरीर काँप रहा था।
“तुम्हें क्या चाहिए, आध्या?” उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी शरारत थी – लेकिन साथ ही एक गहरा प्यार भी।
“मुझे आपका लंड चाहिए, सर,” मैंने कहा। “मुझे आपका लंड अपने अंदर चाहिए।”
उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना सिर उठाया, और मेरी तरफ देखा। “अच्छी लड़की,” उन्होंने कहा। “अब तुम्हें वो मिलेगा जो तुम चाहती हो।”
उन्होंने अपने कपड़े उतारे – धीरे-धीरे, जैसे कोई स्ट्रिपटीज़ कर रहा हो। जब उनका लंड बाहर आया, तो वो पहले से ही कड़ा और तना हुआ था। उन्होंने अपने लंड को मेरी योनि के मुहाने पर रखा, और धीरे-धीरे अंदर डालना शुरू किया।
मैंने कराहते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं। उनका लंड मेरे अंदर धीरे-धीरे फिसल रहा था – मेरी योनि की दीवारों को छूते हुए, मेरी हर नस को जगाते हुए। जब वो पूरी तरह अंदर आ गए, तो उन्होंने रुक कर मेरी तरफ देखा।
“तुम ठीक हो?” उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी चिंता थी।
“हाँ, सर,” मैंने कहा। “मैं ठीक हूँ।” और मैं सच में ठीक थी – क्योंकि वो मेरे साथ थे।
उन्होंने चोदना शुरू किया – पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़। उनके हर धक्के के साथ मेरी कराहें तेज़ होती गईं। उन्होंने मेरे पैर अपने कंधों पर उठाए, और और गहराई में जाने लगे। मैं उनके नीचे तड़पने लगी – दर्द और आनंद के बीच।
“सर.. और..” मैंने कराहते हुए कहा।
“और क्या?” उन्होंने पूछा।
“और ज़ोर से,” मैंने कहा। “मुझे और ज़ोर से चोदो, सर।”
उन्होंने मेरी बात मान ली। उन्होंने मुझे करवट लेने को कहा, और मेरी गांड में अपना लंड डाल दिया। मैं दर्द से चीख उठी – लेकिन उन्होंने रुकना नहीं। उन्होंने मेरी गांड को ज़ोर-ज़ोर से चोदा – बिना किसी रहम के।
“सर.. ये.. ये बहुत है..” मैंने कराहते हुए कहा।
“तुमने कहा था कि तुम सह सकती हो,” उन्होंने कहा। “तो सहो।”
मैंने उनकी बात मान ली। मैंने अपने दाँत भींच लिए, और उनके हर धक्के को सहा। मेरी गांड फट रही थी, और मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे – लेकिन मैंने उन्हें रोका नहीं। क्योंकि मैं जानती थी कि यह मेरा समर्पण है – और मुझे इस पर गर्व है।
जब वो झड़े, तो उन्होंने मेरी गांड में झड़ दिया – उनका गर्म, चिपचिपा वीर्य मेरी गांड में गया। और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं पूरी हो गई हूँ।
उन्होंने मुझे गले लगाया, और मेरे माथे को चूमा। “तुमने आज मुझे पागल कर दिया, आध्या,” उन्होंने कहा।
“और आपने मुझे अपना बना दिया, सर,” मैंने कहा।
भाग 4: दूसरा नियम – मेरे आँसू, उनका प्यार
कुछ दिन बाद, राहुल ने मुझे एक नया नियम बताया। हम बैठक में बैठे थे – और वो मेरी तरफ देख रहे थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी गंभीरता थी।
“जब मैं तुम्हें रुलाऊँ,” उन्होंने कहा, “तो तुम मुझे रोकना मत। तुम रोना – जितना रोना है, रोना। और जब तुम्हारे आँसू खत्म हो जाएँ, तो मैं तुम्हें अपनी बाहों में भर लूँगा।”
“जी सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
उस रात, उन्होंने मुझे रुलाया – बहुत रुलाया। उन्होंने मेरी गांड को इतना चोदा कि मैं 2 घंटे तक रोती रही। मेरी आँखें सूज गईं, मेरा गला बैठ गया, और मेरा शरीर थक गया – लेकिन मैंने उन्हें रोका नहीं। क्योंकि मैं जानती थी कि वो मुझे कभी नहीं तोड़ेंगे – वो सिर्फ मुझे अपना बना रहे हैं।
जब वो रुके, तो उन्होंने मुझे अपनी बाहों में भर लिया। उन्होंने मेरे आँसुओं को चूमा, और मेरे बालों को सहलाया। उनकी उँगलियाँ मेरे निशानों पर फिरीं – धीरे-धीरे, जैसे कोई मरहम लगा रहा हो।
“तुम बहुत बहादुर हो,” उन्होंने कहा। “मुझे तुम पर गर्व है।”
“और मुझे आप पर, सर,” मैंने कहा। “आपने मुझे तोड़ा नहीं – आपने मुझे और मज़बूत बनाया।”
उन्होंने मुझे कसकर अपनी बाहों में भर लिया, और मेरे माथे को चूमा। उस रात, मैं उनकी बाहों में सोई – यह जानते हुए कि मैं दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह पर हूँ।
भाग 5: तीसरा नियम – मेरा शरीर, उनकी इच्छा
राहुल ने मुझे एक और नियम बताया। हम रसोई में थे – और मैं खाना बना रही थी।
“जब हम घर में अकेले हों,” उन्होंने कहा, “तो तुम्हें अपने कपड़े उतार देने चाहिए – बिना किसी सवाल के।”
“जी सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
अब, जब भी हम घर में अकेले होते, मैं अपने कपड़े उतार देती थी। मैं नंगी होकर घर में घूमती थी – रसोई में खाना बनाती थी, बैठक में टीवी देखती थी, और बेडरूम में सोती थी। और राहुल मुझे देखते थे – उनकी आँखों में वो हवस थी जो मुझे पसंद थी। लेकिन उससे भी ज़्यादा, उनकी आँखों में प्यार था – और मुझे यह प्यार चाहिए था।
कभी-कभी, जब मैं खाना बना रही होती थी, तो वो पीछे से आते थे, और मेरी गांड को पकड़ लेते थे। मैं चौंक जाती थी, लेकिन मैं उन्हें रोकती नहीं थी। वो मुझे वहीं, रसोई में, झुकाकर चोदते थे – और मैं उनके हर धक्के को सहती थी। रसोई की ठंडी सतह मेरे हाथों को छू रही थी, और उनकी गर्माहट मेरे अंदर थी – यह एक अजीब सा मिश्रण था, जो मुझे पसंद आने लगा था।
कभी-कभी, जब मैं टीवी देख रही होती थी, तो वो मेरे पास आते थे, और मेरे स्तनों को चूसने लगते थे। मैं कराहने लगती थी, लेकिन मैं उन्हें रोकती नहीं थी। वो मुझे वहीं, सोफे पर, लिटाकर चोदते थे – और मैं उनके हर धक्के को सहती थी।
कभी-कभी, जब मैं सो रही होती थी, तो वो मुझे जगाते थे, और मेरी योनि में अपना लंड डाल देते थे। मैं नींद में कराहने लगती थी, लेकिन मैं उन्हें रोकती नहीं थी। वो मुझे वहीं, बिस्तर पर, चोदते थे – और मैं उनके हर धक्के को सहती थी। नींद और जागृति के बीच की वो अवस्था – जहाँ मुझे सिर्फ उनकी गर्माहट महसूस होती थी – वो मेरे लिए एक अजीब सा सुकून था।
भाग 6: चौथा नियम – मेरा मुँह, उनका आदेश
राहुल ने मुझे एक और नियम बताया। हम बेडरूम में थे – और वो बिस्तर पर बैठे थे।
“जब मैं तुमसे कहूँ,” उन्होंने कहा, “तो तुम मेरे लंड को अपने मुँह में ले लेना – और तब तक चूसना, जब तक मैं संतुष्ट न हो जाऊँ।”
“जी सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
अब, जब भी वो कहते, मैं उनके लंड को अपने मुँह में ले लेती थी। मैं उसे चूसती थी – धीरे-धीरे, फिर तेज़। मैं अपनी जीभ से उसके सिरे को सहलाती थी, और उसकी जड़ को चूमती थी। मैं उसे अपने गले में ले जाती थी – और वो मेरे गले को चोदते थे।
मेरी आँखों से पानी निकलता था, और मेरी लार बहती थी – लेकिन मैं रुकना नहीं चाहती थी। मैं उनके लंड को चूसती रहती थी, और उन्हें अपने गले को चोदने देती थी। और जब वो झड़ते थे, तो वो मेरे गले में झड़ते थे – और मैं उनका सारा वीर्य निगल लेती थी।
कभी-कभी, वो मेरे मुँह में इतनी ज़ोर से चोदते थे कि मुझे उल्टी आ जाती थी। लेकिन मैं रुकती नहीं थी – मैं उनके लंड को चूसती रहती थी, और उन्हें अपने गले को चोदने देती थी। और जब वो झड़ते थे, तो वो मेरे चेहरे पर झड़ते थे – और मैं उनका वीर्य अपने चेहरे पर लगाती थी, और उसे अपनी त्वचा में समाने देती थी।
भाग 7: पाँचवाँ नियम – मेरा दर्द, उनका आनंद
राहुल ने मुझे एक और नियम बताया। हम बैठक में थे – और वो मेरी तरफ देख रहे थे।
“जब मैं तुम्हें दर्द दूँ,” उन्होंने कहा, “तो तुम उसे सहना – बिना किसी शिकायत के। क्योंकि हर दर्द के बाद, मैं तुम्हें प्यार दूँगा।”
“जी सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
अब, जब भी वो मुझे दर्द देते, मैं उसे सहती थी। वो मेरी गांड को इतना चोदते थे कि वो फट जाती थी – लेकिन मैं सहती थी। वो मेरे स्तनों को इतना मरोड़ते थे कि उन पर निशान पड़ जाते थे – लेकिन मैं सहती थी। वो मेरी गर्दन को इतना दबाते थे कि मेरी साँस रुक जाती थी – लेकिन मैं सहती थी।
और हर दर्द के बाद, वो मुझे प्यार देते थे। वो मेरे आँसुओं को चूमते थे, मेरे निशानों को सहलाते थे, और मुझे अपनी बाहों में भर लेते थे। वो मुझसे कहते थे, “तुम बहुत बहादुर हो, आध्या। मुझे तुम पर गर्व है।”
और मैं उनकी बाहों में सिमट जाती थी – यह जानते हुए कि मैं दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह पर हूँ।
भाग 8: वो रात – जब उन्होंने मुझे पूरी तरह अपना बनाया
एक रात, राहुल ने मुझे बेडरूम में बुलाया। जब मैं अंदर गई, तो उन्होंने मुझे बिस्तर पर बैठने का इशारा किया। कमरे में हल्की रोशनी थी – और एक अजीब सी शांति।
“आज मैं तुम्हें कुछ नया सिखाऊँगा,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना थी – और साथ ही एक गहरा प्यार भी।
“जो आप कहें, सर,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी – सिर्फ समर्पण।
उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा किया, और मेरे कपड़े उतारने लगे – धीरे-धीरे, एक-एक करके। जब मैं पूरी तरह नंगी हो गई, तो उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया।
“आज मैं तुम्हें अपनी रखैल बनाऊँगा,” उन्होंने कहा। “पूरी तरह से।”
उन्होंने अपने कपड़े उतारे, और अपना लंड मेरी योनि में डाल दिया। उन्होंने मुझे चोदना शुरू किया – धीरे-धीरे, फिर तेज़। उनके हर धक्के के साथ मेरी कराहें तेज़ होती गईं। उन्होंने मेरे पैर अपने कंधों पर उठाए, और और गहराई में जाने लगे।
“सर.. और..” मैंने कराहते हुए कहा।
“और क्या?” उन्होंने पूछा।
“और ज़ोर से,” मैंने कहा। “मुझे और ज़ोर से चोदो, सर।”
उन्होंने मेरी बात मान ली। उन्होंने मुझे करवट लेने को कहा, और मेरी गांड में अपना लंड डाल दिया। मैं दर्द से चीख उठी – लेकिन उन्होंने रुकना नहीं। उन्होंने मेरी गांड को ज़ोर-ज़ोर से चोदा – बिना किसी रहम के।
“सर.. ये.. ये बहुत है..” मैंने कराहते हुए कहा।
“तुमने कहा था कि तुम सह सकती हो,” उन्होंने कहा। “तो सहो।”
मैंने उनकी बात मान ली। मैंने अपने दाँत भींच लिए, और उनके हर धक्के को सहा। मेरी गांड फट रही थी, और मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे – लेकिन मैंने उन्हें रोका नहीं। क्योंकि मैं जानती थी कि यह मेरा समर्पण है – और मुझे इस पर गर्व है।
जब वो झड़े, तो उन्होंने मेरी गांड में झड़ दिया – उनका गर्म, चिपचिपा वीर्य मेरी गांड में गया। और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं पूरी हो गई हूँ।
उन्होंने मुझे गले लगाया, और मेरे माथे को चूमा। “तुमने आज मुझे पागल कर दिया, आध्या,” उन्होंने कहा।
“और आपने मुझे अपना बना दिया, सर,” मैंने कहा।
अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो आप हमें कमेंट में बताएं। और अगर आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है, तो हमें ज़रूर सुनाएं। क्योंकि हर कहानी में एक सीख होती है, और हर प्यार में एक समर्पण छिपा होता है।